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संघ बनाम स्वतंत्रता

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भारत सरकार अधिनियम से राज्यों की इस स्थिति में कोई अंतर नहीं आता। राज्य संघ के बावजूद विदेशी राज्य - क्षेत्र हैं, जैसे कि वे संघ से पूर्व थे। यह भारतीय संघ के बारे में सबसे असाधारण स्थिति हैं, अर्थात् अलग - अलग इकाइयां अपने में ही विदेशी राज्य हैं। चूंकि यह अधिनियम राज्यों को सम्राट के अधीनस्थ क्षेत्र नहीं मानता, अतः संसद को कोई अधिकार नहीं है कि वह उनके बारे में कोई कानून बनाए। संसद विलय - पत्र के कारण राज्यों पर अपना प्राधिकार रखती है। ऐसा होने के कारण संसद का प्राधिकार जो उसे राज्यों ने विलय - पत्र द्वारा हस्तांतरित किया है वहीं तक ही सीमित हो सकता है। यदि क्योंकि प्रीवी काउंसिल की ही भाषा का प्रयोग किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि कोई भी धारा अपने स्रोत से ऊपर नहीं उठ सकती, इसी प्रकर संसद के पास विलय - पत्र द्वारा दिए गए प्राधिकार से बढ़कर राज्यों पर प्राधिकार नहीं हो सकता। इसी से यह स्पष्ट होता है कि संशोधन के बारे में संसद का प्राधिकार सीमित क्यों है।

अभी तक जो विश्लेषण किया गया है, उससे यह प्रतीत होता है कि विलय - पत्र द्वारा परिवर्तन करने के लिए संसद को दिया गया प्राधिकार सीमित है और प्राधिकार में किसी भी आधिक्य के लिए राजाओं से पूर्व सहमति ली जानी चाहिए। इस अधिनियम के उपबंधों के वैधिक प्रभाव के रूप में यह स्तब्धकारी नहीं हो सकता। परंतु इस तथ्य पर विचार किया जाए कि जिन उपबंधों में परिवर्तन करने की संसद को कोई शक्ति नहीं है, उनमें से ऐसे उपबंध शामिल हैं, जो रक्षा और विदेशी मामलों को आरक्षित विषयों के वर्ग से हस्तांतरित विषयों में परिवर्तन करने से संबंधित हैं और उसके पास तब तक कोई शक्ति नहीं होगी, जब राजा लोग स्पष्ट रूप से यह पुष्टि करने के लिए सहमति न दे दें कि यह संसद का प्राधिकार है और उसे ऐसा करने की अनुमति है। आप यह अनुभव करने की स्थिति में होंगे कि ऐसे संघ के परिणाम कितने भयंकर हो सकते हैं। संघ की स्थापना का अर्थ यह है कि स्वामित्व की शक्ति संसद के हाथों से निकल कर राजाओं के हाथों में चली गई है। यह संघ राजाओं को अपना भाग्य - विधाता बनाता है। उनकी सहमति के बिना भारत राजनीतिक रूप से प्रगति नहीं करर सकता।

इस संघ के अन्य परिणामों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मैं इस समय केवल एक परिणाम का उल्लेख करूंगा। वह यह है कि यदि इस संघ को स्वीकार कर लिया जाए तो ब्रिटिश भारत के लोगों की परिवर्तन के लिए उनके संघर्ष की स्थिति कमजोर हो जाएगी। अभी तक भारतीय लोग और ब्रिटिश संसद के बीच संघर्ष की स्थिति में ब्रिटिश संसद सदैव ही कमजोर रही है। उसके पास अपनी इच्छा - शक्ति के सिवा लोगों के परिवर्तन के अधिकार का विरोध करने के लिए कुछ भी न था। संघ के विपरीत स्थिति हो जाएगी। भारतीय लोग कमजोर स्थिति में होंगे और संसद की स्थिति अधिक मजबूत हो जाएगी। संघ के बाद संसद यह कहने की स्थिति में होगी कि वह परिवर्तन की मांग को स्वीकार करने के लिए इच्छुक है, परन्तु परिवर्तन के लिए उसका प्राधिकार सीमित है, इसलिए परिवर्तन की मांग उठाने से पूर्व भारतीयों को राजाओं की सहमति प्राप्त कर लेनी चाहिए। ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे संसद को यह मुद्दा बनाने से रोका जाए।