2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 124

संघ बनाम स्वतंत्रता

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500 रुपये है और उसकी जनसंख्या 206 है। एक राज्य का राजस्व 165 रुपये है और उसकी जनसंख्या 125 है। एक अन्य राज्य का राजस्व 128 रुपये है और जनसंख्या 147 है। एक राज्य ऐसा भी है, जिसका राजस्व 80 रुपये है और इसकी जनसंख्या 27 है। इनमें से प्रत्येक राज्य स्वशासी राज्य है। भले ही इनमें से एक राज्य का राजस्व 80 रुपये है और उसकी जनसंख्या 27 है।

इन राज्यों के स्वशासी होने का अर्थ यह है कि उनमें से प्रत्येक राज्य को अपने ऊपर यह उत्तरदायित्व लेना चाहिए कि वह अपन प्रजा को ऐसी सभी सेवाओं की आपूर्ति करे, जिनका संबंध कानून और व्यवस्था के अंतर्गत राजस्व, कार्यपालिका और न्यायपालिका के मामलों से हो और ऐसी सभी सेवाओं की आपूर्ति की जानी चाहिए जो सार्वजनिक कल्याण कार्य, जैसे शिक्षा, सफाई, सड़क, आदि को प्रभावित करती हैं। हम बंबई के लोग 12 करोड़ रुपये के राजस्व से शिष्ट प्रशासन के मानक को बनाए रखने में कठिनाई महसूस करते हैं। अन्य प्रांतों में भी समान राजस्व के होते हुए भी इसी प्रकार की कठिनाई रहती है। ऐसी स्थिति में अल्प राजस्व और अल्प जनसंख्या वाले ये छोटे राज्य अपने लोगों की किसी भी मांग को कैसे पूरा कर सकते हैं? सर्वोत्तम आदर्श और उद्देश्य से प्रेरित राजा के होते हुए भी यह कार्य नैराश्यपूर्ण है।

अब केवल यही मार्ग है कि देशी राज्यों द्वारा अधिकृत कुल क्षेत्र का पुनर्गठन किया जाए। इसका उचित समाधान यह होगा कि निश्चित आकार और निश्चित राजस्व वाले क्षेत्र को निर्धारित किया जाए और इसे एक प्रांत में संगठित कर लिया जाए तथा इन क्षेत्रों के शासकों को पेंशन दे दी जाए। केवल ऐसे ही राज्यों को बनाए रखना चाहिए, जिनके क्षेत्र और राजस्व को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वे अपने संसाधनों के कारण ऐसी स्थिति में हैं कि प्रशासन का उत्तम मानक उपलब्ध करा सकते हैं। जो राज्य इस परीक्षण में खरे नहीं उतरते, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। इसके अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं है। मेरी धारणा है कि ऐसा करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।

मैं समझता हूं कि कुछ लोग यह मानेंगे कि राजा को अपने राज्य - क्षेत्र में शासन करने का अधिकार विरासत में मिला है। परंतु मैं यह जानना चाहता हूं कि राजा के अधिकार और प्रजा के कल्याण में अधिक महत्वपूर्ण क्या है? मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि राज्यों के सबसे अच्छे मित्र भी यह नहीं कहेंगे कि राजा के अधिकार प्रजा के कल्याण से अधिक महत्वपूर्ण हैं। यदि इन दोनों में संघर्ष है तो किसे हट जाना चाहिए? इस बारे में मुझे विश्वास है कि राज्यों के सबसे अच्छे मित्र भी यह नहीं कहना चाहेंगे कि राजा के अधिकारों को बनाए रखने के लिए लोगों के कल्याण की बलि दे दी जाए।

देशी राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न राजनीतिक प्रश्न नहीं है। मेरे विचार में यह विशुद्ध प्रशासकीय और आवश्यक प्रश्न है। इसका समाधान न करना राज्यों के उन लाखों लोगों की भर्त्सना करना है, जो निरंतर दुखी और असुरक्षित जीवन बिता रहे हैं। मैं जिस उपाय का सुझाव दे रहा हूं, वह कोई क्रांतिकारी उपाय नहीं है। किसी