108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
राजा को पेंशन देना और उसके राज्य पर अधिकार करना विधिसम्मत मार्ग है और यह भूमि अधिग्रहण अधिनियम के उन नियमों के अंतर्गत है, जिनसे हम परिचित हैं और जिनके द्वारा सार्वजनिक हित के लिए निजी अधिकारों और संपत्तियों के अर्जन के लिए अनुमति दी जाती है।
दुर्भाग्यवश देशी राज्यों के प्रश्न का समाधान अभी तक इस दृष्टिकोण से नहीं किया गया है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न जिसे मैं आपके सामने रखना चाहता हूं, यह है कि संघ की स्थापना के बाद क्या इस प्रश्न का समाधान करने में आप स्वतंत्र होंगे। मैं कहता हूं कि ऐसा नहीं होगा। शायद आप पूछना चाहेंगे कि ऐसा क्यों है और इस प्रकार का निष्कर्ष कैसे निकाला है?
मैं पहले ही बता चुका हूं कि संघ में सम्मिलित होने के संबंध में प्रांतों और राज्यों का अलग - अलग आधार है। प्रांतों के समक्ष कोई विकल्प नहीं है। उन्हें संघ की इकाइयां बनने के लिए सहमत होना चाहिए। राज्यों के समक्ष विकल्प है। वे संघ में सम्मिलित हो सकते हैं अथवा संघ में सम्मिलित होने से इंकार कर सकते हैं। यह स्थिति प्रांतों के दृष्टिकोण और राज्यों के दृष्टिकोण की वजह से है। संघ के दृष्टिकोण से कया स्थिति है? क्या संघ राज्यों के प्रवेश के मामले में कोई विकल्प रखता है? क्या संघ किसी राज्य को अपने में सम्मिलित करने से इंकार कर सकता है? इसका उत्तर नकारात्मक है। संघ को इंकार करने का कोई अधिकार नहीं हैं। राज्य को संघ में प्रवेश करने का अधिकार है, परन्तु संघ को बीस वर्ष तक के लिए किसी भी दशा में उसके प्रवेश करने से इंकार करने का कोई अधिकार नहीं है। स्थिति यह है। अब किसी भी राज्य के संघ में प्रवेश करने का क्या अर्थ है? मेरे विचार से राज्य के संघ में प्रवेश करने का अर्थ है, राज्य की प्रभुसत्ता को मान्यता देना। उसकी प्रभुसत्ता को मान्यता देने का अर्थ उसके अस्तित्व को मान्यता देना है, जिसका अर्थ यह है कि उसे अपने राज्य - क्षेत्र तथा आंतरिक प्रशासन की शक्तियों की गारंटी की सत्यनिष्ठा का अधिकार है। यह बात उस राज्य पर भी लागू होगी, जिसकी जनसंख्या 27 है और जिसका राजस्व 80 रुपये है। संघ में राज्य के प्रवेश के निहितार्थों को ध्यान में रखते हुए मैं यह सुझाव देने में पूर्णतया न्यायसंगत हूं कि देशी राज्यों के राज्य - क्षेत्र का पुनर्गठन संघ की स्थापना के बाद संभव नहीं होगा और देशी राज्यों के लोग कुशासन और कुप्रशासन के सदैव शिकार रहेंगे।
क्या ब्रिटिश भारत अब इस मामले में कुछ कर सकेगा? मेरे विचार से ब्रिटिश भारत ऐसी स्थिति में नहीं है कि इस मामले मे कुछ कर सके। यदि ब्रिटिश भारत ने अपने लिए उत्तरदायी सरकार प्राप्त कर ली होती तो वह अधिकारपूर्वक यह कहने की स्थिति में होता कि किस राज्य को प्रवेश करने देना चाहिए और इसके लिए क्या शर्तें होंगी। वह संघ में प्रवेश के लिए राज्यों पर उनके राज्य - क्षेत्र को बड़ी इकाइयांं में पुनर्गठित करने की पूर्व शर्त लगाने की स्थिति में होता। दुर्भाग्यवश ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी सरकार नहीं है। वास्तव में केन्द्र में उत्तरदायी सरकार रखने के उसके अधिकार को