संघ बनाम स्वतंत्रता
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नकार दिया गया है और राज्यों के प्रवेश पर उसे आश्रित बना दिया गया है। अब ब्रिटिश भारत का भाग्य यह है कि ‘कोई राज्य नहीं और कोई उत्तरदायित्व नहीं।’ अब ब्रिटिश भारत ऐसी स्थिति में नहीं है कि राज्यों के सामने शर्तें रख सके। वह ऐसा तभी कर सकता था जब उसकी उत्तरदायी सरकार होती, यही कारण है कि मैंने कहा है और सदैव इस बात को स्वीकार किया है कि ब्रिटिश भारत के लोगों को सबसे पहले संघ की और ब्रिटिश भारत तक सीमित उत्तरदायित्व की मांग करनी चाहिए। यदि एक बार उसे प्राप्त कर लिया जाता है, तो चहुं ओर स्वतंत्रता और श्रेष्ठ सरकार के आधार पर अखिल भारतीय संघ के लिए संभव मार्ग होगा। यह संभावना समाप्त हो जाएगी, यदि यह संघ अस्तित्व में आता है।
मैं पहले ही संघीय योजना की कतिपय कमियों की ओर आपका ध्यान आकर्षित कर चुका हूं। अभी मैंने कमी की अपेक्षा कुछ अन्य गहन बात की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया है। यह संघ की नियति है। जहां तक राज्यों के लोगों का संबंध है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। यह ऐसा है कि यदि एक बर कार्यान्वित कर लिया गया तो उससे कभी भी छुटकारा नहीं मिलेगा।
देशी राज्य की समस्या एक ऐसी समस्या है जिसका, मेरा विश्वास है, सर्वोपरि सत्ता द्वारा उन उपायों से निराकरण किया जा सकता है, जिनके बारे में मैंने सुझाव दिया है अथवा किसी ऐसी युक्ति से उसका समाधान किया जा सकता है, जो जनता के कल्याण में बराबर लगी हुई है, यदि वे समस्या का हल करना चाहते हैं। सर्वोपरि सत्ता हिन्दू धर्म की त्रिमूर्ति के समान है। यह ब्रह्मा है, क्योंकि इसने राज्यों को जन्म दिया है। यह विष्णु है, क्योंकि इसने उनका संरक्षण किया है। यह शिव है, क्योंकि उसमें उनको नष्ट करने की शक्ति है। सर्वोपरि सत्ता ने राज्यों के संबंध में अलग - अलग समय पर यह सभी भूमिकाएं अदा की हैं। एक समय इसने शिव की भूमिका अदा कि। अब यह विष्णु की भूमिका अदा कर रही है। राज्यों के संबंध में विष्णु की भूमिका का निर्वाह लोगों का भला करने की दृष्टि से क्रूरतम कार्य है। क्या ब्रिटिश भारत को इसका एक पक्ष होना चाहिए? यह बात आपके विचार करने के लिए है।
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राज्यों के बिना संघ
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एक अन्य दृष्टिकोण है, जिसके अनुसार संघ के मामले में विचार - विमर्श किया जाता है। अब मुझे उस तर्क की जांच करनी चाहिए।
यह तर्क दिया जाता है कि संविधान स्वशासी प्रांतों का सृजन करता है। प्रांतों की स्वायत्तता का अर्थ स्वतंत्रता है और इसलिए ब्रिटिश भारत की एकता का खंडन होता है। इसका विरोध किया जाना चाहिए। कुछ बाध्यकारी शक्ति दी जानी चाहिए, ताकि प्रांतों को एक साथ एकता और समानता में बांध लिया जाए और गत 100 वर्षों के ब्रिटिश प्रशासन