110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के फलस्वरूप निर्मित एकता और समानता को अक्षुण्ण रखा जा सके।
यह तर्क काफी ठोस है, यदि इसका केवल यही अर्थ है कि स्वशासी प्रांतों का सृजन केन्द्रीय सरकार के निर्माण की एक आवश्यकता है। मुझे विश्वास है कि इस प्रस्ताव को सर्वत्र स्वीकृति प्राप्त होगी। सभी गोलमेज सम्मेलनों में स्वर्गीय सर मोहम्मद इकबाल ही एकमात्र ही एकमात्र ऐसे प्रतिनिधि थे, जिन्होंने केन्द्रीय सरकार की स्थापना का विरोध किया था। अन्य सभी प्रतिनिधियों ने, चाहे वे किसी भी जाति व मत के क्यों न रहे हों, उनसे मतभेद व्यक्त किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्वशासी प्रांतों के सृजन से केन्द्रीय सरकार की स्थापना स्पष्ट तथा अनिवार्य है और उसके बिना स्वायत्तता अराजकता में परिवर्तित हो जाएगी।
परंतु यह तर्क अपने वैधिक कार्य - क्षेत्र से परे है। यह अखिल भारत के लिए केन्द्रीय सरकार की स्थापना को न्यायसंगत ठहराता है। ब्रिटिश भारत के लिए केन्द्रीय सरकार की स्थापना को न्यायसंगत ठहराने वाला यह तर्क समस्त भारत के लिए केन्द्रीय सरकार को न्यायसंगत बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। और आपको इस प्रश्न पर विचार करना है कि क्या ब्रिटिश भारत में स्वशासी प्रांतों के निर्माण की दृष्टि से देशी राज्यों को सम्मिलित करते हुए समस्त भारत के लिए केन्द्रीय सरकार को न्यायसंगत कहा जा सकता है। मेरा तर्क यह है कि स्वशासी प्रांतों के निर्माण के लिए समस्त भारत हेतु केन्द्रीय सरकार के निर्माण की आवश्यकता नहीं है।
ब्रिटिश भारत में स्वशासी प्रांतों की स्थापना के लिए दो बातें आवश्यक होंगी - (1) ब्रिटिश भारत के लिए केन्द्रीय सरकार होगी, और (2) केन्द्रीय सरकार अपने स्वरूप में संघीय होगी तथा एकात्मक नहीं होगी। संघ का सार केन्द्रीय सरकार और इकाइयों में विधि द्वारा विधायी और कार्यकारी शक्तियों के विभाजन अथवा आबंटन में विहित होता है। इकाइयों और केन्द्र की शक्तियों को परिभाषित किया जाता है तथा उन्हें अलग - अलग किया जाता है। उनमें से किसी को अधिकार नहीं होता कि वे दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप करें। प्रांतों की स्वायत्तता का अर्थ है कि उनकी शक्तियों को परिभाषित किया जाता है और उनमें विहित किया जाता है। यदि प्रांतीय स्वायत्तता को वास्तविक बनाना है तो केन्द्रीय सरकार की शक्तियों को भी सीमित किया जाना चाहिए, अन्यथा वह प्रांतों के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की स्थिति में होगी। यदि इस बात को सहज रूप से कहा जाए तो स्वायत्तता का अर्थ कानून द्वारा शक्तियों की परिभाषा और परिसीमन है और जहां कहीं भी इन दोनों राजनीतिक इकाइयों के बीच शक्तियों की परिभाषा और परिसीमन है, वहां संघ है और इसे होना चाहिए। अब आप यह समझेंगे कि मैंने क्यों कहा था कि प्रांतीय स्वायत्तता की सभी मांगों का सार है कि ब्रिटिश भारत के लिए केन्द्रीय सरकार का स्वरूप संघीय होगा। इससे अखिल भारतीय संघ न्यायसंगत नहीं ठहरता। यह क्यों आवश्यक है कि सभी राज्यों को संघ में लाया जाए। अभी तक इस प्रश्न का उत्तर शेष है और वे सभी लोग इस प्रश्न का उत्तर देंगे, जो इस अखिल भारतीय संघ को ब्रिटिश भारत संघ से अलग समझते हैं।