संघ बनाम स्वतंत्रता
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भारत को उस मूल्य के लिए कुछ प्रतिकार मिल जाता, जो उसने राजाओं को संघ में सम्मिलित होने के लिए चुकाया है। परंतु ब्रिटिश भारत को कोई भी जिम्मेदारी नहीं दी गई, जिसका उल्लेख किया जाए। ब्रिटिश भारत को जो मिला, वह एक ऐसी पद्धति है जिसमें जिम्मेदारी को अलग - अलग भागों में विभाजित किया गया है तथा शर्तों और प्रतिबंधों द्वारा सार को नष्ट - भ्रष्ट कर दिया गया है। यही नहीं कि ब्रिटिश भारत ने राजाओं के लिए संघ को सरल बनाने के लिए जो त्याग किए उसके अनुरूप उसे केन्द्र में उत्तरदायित्व प्राप्त नहीं हुआ, अपितु उसने अपने ही अधिकार से और राजाओं से स्वतंत्र रूप से औपनिवेशिक राज्य के दावे को
खो दिया है। अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि अखिल भारतीय संघ के कार्य - व्यापार में ब्रिटिश भारत ने क्या खोया है और वह क्या खोएगा। नया संविधान ब्रिटिश भारत के लोगों के संघर्ष का परिणाम है। यह ब्रिटिश भारत के लोगों का विद्रोह और यातनाओं का परिणाम है, जो इस संविधान के पीछे बल लगाती रही है। वह क्या अधिकार था, जिसे ब्रिटिश भारत के लोगों ने अपने लिए दावा किया था? जैसा कि मैंने कहा है कि उनका पहला दावा यह था कि ब्रिटिश भारत में एक श्रेष्ठ सरकार गठित की जाए। उसके बाद उन्होंने ब्रिटिश भारत के लिए उत्तरदायी स्वशासी सरकार का दावा किया। अंत में उन्होंने ब्रिटिश भारत के लिए औपनिवेशिक राज्य की मांग की। इन दावों में से प्रत्येक दावे को ब्रिटिश संसद द्वारा स्वीकार कर लिया गया। 1917 में ब्रिटिश संसद ने उत्तरदायी सरकार के लक्ष्य को स्वीकार किया। 1929 में अंग्रेजों ने औपनिवेशिक राज्य के लक्ष्य को भी स्वीकार कर लिया। अब इस बात पर बल देना चाहिए कि प्रत्येक समय पर जो दावा किया गया, वह ब्रिटिश भारत के लोगों के नाम पर किया गया। प्रत्येक अवसर पर ब्रिटिश भारत के लोगों के संबंध में इसे स्वीकार किया गया। संघ के फलस्वरूप ब्रिटिश भारत की स्थिति क्या होगी? ब्रिटिश भारत की स्थिति यह है कि केन्द्र में वे कभी भी कोई जिम्मेदारी प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक कि राजा लोग इस योजना के अंतर्गत नहीं आ जाते। इसका अर्थ यह है कि ब्रिटिश भारत ने अपने ही लिए अपने नाम में और राजाओं से स्वतंत्र होकर उत्तरदायी सरकार के दावे के अधिकार को खो दिया है। यह अधिकार एक विहित अधिकार था, क्योंकि यह किए गए और स्वीकृत दावे का परिणाम था। यह अधिकार खो दिया गया है, क्योंकि ब्रिटिश भारत को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राज्यों की इच्छाओं पर आश्रित होना पड़ा है। संघ के दोनों भागों में से ब्रिटिश भारत प्रगतिशील भाग है और राज्य प्रगतिहीन भाग है। प्रगतिशील भाग को प्रगतिहीन रथ के साथ बांध दिया जाना और उसके मार्ग तथा लक्ष्य को प्रगतिहीन भाग पर आधारित किया जाना, इस संघ का सबसे दुखद पहलू है।
इस त्रासदी के लिए आप अपने ही राष्ट्रीय नेताओं को दोषी ठहराएं। सौभाग्यवश मैं आपके राष्ट्रीय नेताओं में से नहीं हूं। सबसे ऊंची पदवी जो मुझे मिली है; वह अस्पृश्यों का नेता होना है। मैं यह भी देखता हूं कि मुझे इस पदवी से भी वंचित कर दिया गया है। ठक्करबापा, महात्मा गांधी के बांए हाथ हैं। मैं उन्हें उनका बाया हाथ इसलिए कहता हूं कि वल्लभभाई पटेल उनके दाएं हाथ हैं। ठक्करबापा ने कुछ ही समय पूर्व यह कहा था कि मैं महारों का ही नेता हूं। वह मुझे बंबई प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों का नेतृत्व भी देना