114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
नहीं चाहेंगे। ठक्करबापा ने जो कुछ भी कहा, वह द्वेषपूर्ण था अथवा सत्यता के प्रेम से ओतप्रोत, इसकी मुझे कोई चिंता नहीं है, क्योंकि राजनीति मेरे लिए प्रथम प्रेम नहीं है और न मैं राष्ट्रीय नेतृत्व को अपने जीवन का लक्ष्य मानता हूं। दूसरी ओर, जब मैं देखता हूं कि आपके राष्ट्रीय नेताओं ने देश में कितनी विपदाएं उत्पन्न कर दी हैं तो मुझे यह जानकर निश्चित रूप से राहत मिलती है कि मैं उन महान नेताओं की भीड़ में सम्मिलित नहीं हूं। जब मैं यह कहता हूं कि आपके रष्ट्रीय नेताओं में से कुछ नेता संविधान निर्माण के कार्य के लिए एकदम तैयार नहीं थे तो मेरा विश्वास कीजिए। वे संविधानों के तुलनात्मक अध्ययन के बिना ही गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए और उन्होंने उन समस्याओं के समाधान के लिए कोई भी प्रतिपादन नहीं किया, जो उनके सम्मुख प्रस्तुत की गई। अन्य नेता निस्संदेह इस समस्या के समाधान के लिए समक्ष थे, परंतु वे उन छोटे बच्चों के समान थे, जिनमें संघवाद का आदर्श कूट - कूट कर भरा हुआ था और उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि वे जो निर्माण कर रहे हैं, वह आदर्श संघ या संघ के नाम पर धोखा है। यह त्रासदी पूर्णतया गलत नेतृत्व के कारण उत्पन्न हुई। मैं नहीं जानता कि जो कदम उठाए गए हैं, क्या वे वापस लिए जा सकते हैं। और जो पराजय हुई है, क्या उसे फिर से विजित किया जा सकता है। परंतु मेरा मत है कि यह बात ठीक है कि ब्रिटिश भारत के लोगों को यह जानना चाहिए कि उन्होंने क्या खोया है। उनका अपना ही संघ है और वे यह अधिकार रखते हैं कि अपने संघ के लिए उत्तरदायित्व की मांग करें।
एक अन्य कारण से भी यह वांछनीय होगा कि संघ केवल ब्रिटिश भारत से ही बने। ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों का संघ सद्भाव से कार्य नहीं कर सकता। ये ऐसे दो तत्व हैं, जिनके बारे में मुझे विश्वास है कि वे ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के बीच संघर्ष उत्पन्न करेंगे। पहला तत्व ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों और देशी राज्यों के प्रतिनिधियों की स्थिति में अंतर होने से उत्पन्न होता है। ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि स्वतंत्र होंगे। देशी राज्यों के प्रतिनिधि राजनीतिक विभाग के बंधुआ व्यक्ति होंगे। संघीय विधान-मंडल में प्रतिनिधियां के दोनों वर्गों के अधिदेश के स्रोत अलग - अलग होंगे। ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि मंत्रियों के प्राधिकार के विस्तार में लगे रहेंगे। राज्यों के प्रतिनिधि निश्चय ही मंत्रियों के विरुद्ध गवर्नर - जनरल के प्राधिकार को समर्थन देंगे और उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। यह संघर्ष अनिवार्य है और यह सुनिश्चित है कि ब्रिटिश भारत की भावनाएं देशी राज्यों के विरुद्ध कटुतापूर्ण होंगी। ठीक यही स्थिति प्रांतों के गत शासन में उत्पन्न हुई थी। निर्वाचित सदस्यों की भावनाएं पुरानी प्रांतीय परिषदों के नामांकित सदस्यों की ओर निश्चित ही शत्रुवत थीं। मुझे विश्वास है कि ऐसा अनुभव संघीय विधान-मंडल में फिर से दोहराया जाएगा। ऐसा ही होना स्वाभाविक है, जब कि सदन का एक भाग यह महसूस करता है कि सदन का दूसरा भाग उसकी इच्छाओं को निष्फल करने के लिए है और वह विधान-मंडल के नियंत्रण के बाहर किसी शक्ति के औजार के रूप में कार्य कर रहा है। यह असंगति का एक तत्व है। असंगति का दूसरा तत्व संघ के अंतर्गत ब्रिटिश भारत के राज्यों की स्थिति में अंतर है। कानून के समक्ष समता एक मूल्यवान वस्तु है,