2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 132

संघ बनाम स्वतंत्रता

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परन्तु सभी व्यक्ति उसे एक ही कारण के लिए मूल्यवान नहीं समझते। अधिकांश लोग उसे आदर्श के रूप में चरितार्थ करते हैं। कुछ ही व्यक्ति यह महसूस कर पाते हैं कि वह जटिल क्यों है। कानून के समक्ष समता व्यक्तियों को इस बात पर बाध्य करती है कि वे उन लोगों के साथ एक आम मुद्दा बना लें, जो समान रूप से प्रभावित हुए हैं। यदि कोई समता नहीं है और यदि कुछ ही व्यक्तियों का पक्ष लिया जाता है तथा अन्य व्यक्तियों को बोझिल कर दिया जाता है तो विशेष रूप से अनुकंपा प्राप्त व्यक्ति उन लोगों के साथ सम्मिलित होने से इंकार ही नहीं करते, अपितु वास्तव में उनके विरुद्ध कार्य करते है। एक तानाशाह प्राचीनकाल के सम्राटों के समान कुछ व्यक्तियों के एक के बाद दूसरे दांत उखाड़ देता है और अन्य व्यक्तियों के क्रोध को उत्तेजित किए बिना ऐसा कर लेता है। इसके विपरीत, अन्य व्यक्ति धावे में शामिल हो जाएंगे। परंतु मान लीजिए कि एक कानून बनाया गया कि सभी व्यक्तियों को तानाशाह को उतना धन देना होगा जितना वह मांगता है और नहीं देने पर दंड स्वरूप उनके दांत निकाल दिए जाएंगे तो सभी व्यक्ति इसके विरोध में उठ खड़े होंगे। संघ के अंतर्गत ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों में कोई समानता नहीं है। देशी राज्य कई लाभों का आनंद उठाते हैं और उन्हें कई छूट मिल जाती हैं, जिनसे ब्रिटिश भारत वंचित रह जाता है। यह स्थिति विशेष कर - निर्धारण के मामले में है। इससे ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों और देशी राज्यों के प्रतिनिधियों के बीच गहन कटुता उत्पन्न हो जाएगी कि सबसे पहले इस कर - भार को कौन स्वीकार करे। देशप्रेम उस समय गायब हो जाता है, जब आप किसी की जेब में हाथ डालते हैं, और मैं इस बात से आश्वस्त हूं कि राज्यों के प्रतिनिधि आम आदमी की आवश्यकताओं की तुलना में अपने वित्तीय हित को वरीयता देना चाहेंगे और इसके लिए विधान-मंडल के प्रति कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाना चाहेंगे।

ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों को एक ही विशाल भवन में स्थान देने का क्या लाभ है, यदि वे दोनों एक - दूसरे से लड़ते रहेंगे?

ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों में प्रचलित सरकारी स्वरूपों में पूर्ण असमानता है तथा उनके अंतर्निहित नियमों में भी समानता नहीं है। इन असमानताओं से देशी राज्यों और ब्रिटिश भारत के बीच बैरभाव उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है, यदि ये दोनों अपने अलग - अलग क्षेत्रों में प्रगति करना चाहते हैं। जब तक देशी राज्यों में सरकार का स्वरूप ऐसे मामलों के निर्णय में कारक नहीं बन जाता है जो ब्रिटिश भारत को प्रभावित करते हैं, तो ब्रिटिश भारत को सरकार के उन स्वरूपों को सहन करना चाहिए, चाहे वे कितने ही पुराने क्यों न हां। परंतु संघ उन्हें कारक बनाता है और एक सशक्त कारक बनाता है तथा ब्रिटिश भारत उनके प्रति विमुख नहीं हो सकता। वास्तव में संघ का निर्माण ब्रिटिश भारत को इस बात के लिए बाध्य करेगा कि देशी राज्यों में प्रचलित सरकार के स्वरूपों को क्रांतिकारी बनाने के लिए अपने ही हित में आंदोलन प्रारंभ करे।

यह संघ का अनिवार्य परिणाम होगा। क्या यह ऐसी निष्पत्ति है, जिसे राज्य तत्परतापूर्ण ढंग से चाहते हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर वे विचार करना चाहेंगे।