2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 134

संघ बनाम स्वतंत्रता

117

निर्णय का अर्थ यह था कि राजा लोग भारत सरकार के राजनीतिक विभाग के पूर्णतया अधीन थे और वे लोग इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से छुटकारा पाने की तलाश में लगे हुए थे, जिसमें कि वे घिर गए थे और उन्होंने यह ठीक ही पाया कि केवल एक समाधान है जो उन्हें राजनीतिक विभाग के अत्याचार से छुटकारा दिला सकता है और वह संघ है, क्योंकि जिस सीमा तक संघीय प्राधिकार बना हुआ था, उससे राजनीतिक विभाग का प्राधिकार समाप्त हो जाएगा और संघीय विधान-मंडल और संघीय कार्यपालिका द्वारा संघीय प्राधिकार प्रयोग किया जा सकेगा, क्योंकि संघीय विधान-मंडल और संघीय कार्यपालिका में उनका स्वर मुखर होगा, उन्होंने संघ के पक्ष में निर्णय लिया। राजाओं की समस्या के संघीय समाधान ने उनके समक्ष दो लाभ प्रस्तुत किए। इनमें से पहला यह था कि राज्यों की ऐसी आंतरिक स्वायत्तता सुरक्षित होगी, जिसके लिए वे अधिक व्यग्र थे, क्योंकि इकाइयों को संघीय बनाने का सार यह है कि उनके हाथों में सभी शक्तियां बनी रहें, सिवाय उन शक्तियों के जिन्हें उन्होंने स्वेच्छा से केन्द्र को सौंप दिया है और जिन पर वे स्वयं भी किसी सीमा तक नियंत्रण करने के अधिकारी हैं। संघ का दूसरा लाभ यह था कि संघीय प्राधिकार के कार्य - क्षेत्र तक प्रभुसत्ता समाप्त हो जाएगी। इसलिए राजाओं का उद्देश्य स्वार्थ से भरा हुआ था और उनका प्रमुख उद्देश्य यह था कि वे यथासंभव भारत सरकार के राजनीतिक विभाग के प्राधिकार से मुक्त हो जाएं। यह राजाओं के प्रमुख हितों में से एक हित था। राजाओं को सुरक्षित रखने के लिए एक दूसरा हित यह था कि यथासंभव उनके नागरिक और सैन्य सरकार की अपनी शक्तियों को सुरक्षित किया जाए। वे संघ को इतना दुर्बल बनाना चाहते थे, जितना कि संभव था, ताकि संघ उन पर कठोरता से व्यवहार न करे। राजाओं का हित दोहरा है। वे प्रभुसत्ता से बचना चाहते थे। दूसरे, वे नहीं चाहते थे कि संघ के प्राधिकार के अंतर्गत उन पर अधिक आधिपत्य रखा जाए। राजाओं ने संघ पर विचार करते हुए अपने सामने दो प्रश्न रखे। यह संघ उन्हें प्रभुसत्ता के अत्याचार से कितना बचा पाएगा? दूसरे, संघ की यह योजना उनकी प्रभुसंपन्नता और आंतरिक सरकार की उनकी शक्तियों को किस सीमा तक ले लेगी? वे पहले दृष्टिकोण से बहुत कुछ पाना चाहते थे और दूसरे में कम से कम देना चाहते थे।

मुसलमानों का जो हित था उसने उनकी पूर्ण दृष्टि को न केवल रंग दिया, बल्कि उसे इतना सीमित कर दिया कि उन्होंने कुछ और देखने की चिंता ही नहीं की। उनका हित अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में ही था। वे अपने बचाव के लिए केवल यही जानते थे कि हिन्दू बहुसंख्यक वर्ग से कैसे छुटकारा पाया जाए। इसके फलस्वरूप उन्होंने अलग निर्वाचक - मंडल तथा प्रतिनिधित्व में अधिकता के साथ सीटों के आरक्षण के लिए मांग की। 1930 में उन्होंने यह पाया कि मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग को बचने के लिए एक अन्य प्रभावशाली तरीका है। वह यह था कि नए प्रांत बना लिए जाएं, जिनमें मुस्लिम बहुसंख्यक हों और हिन्दू अल्पसंख्यक। यह उन प्रांतों के प्रतिक्रियास्वरूप था, जहां