118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हिन्दू बहुसंख्यक थे और मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग के थे। उन्होंने इस पद्धति पर इसलिए बल दिया, क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि प्रांतों के संतुलन की इस पद्धति से मुसलमानों को मुस्लिम बहुल प्रांतों में हिन्दू अल्पसंख्यकों को अपने प्रांतों में बंधक जैसी स्थिति में रखने का अवसर मिलेगा, ताकि हिन्दू बहुसंख्यक वर्ग उन प्रांतों में मुसलमानों के साथ भला व्यवहार करें, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग के थे। उनका सबसे प्रबल हित यह था कि मुस्लिम बहुल प्रांत बना दिए जाएं और उन्हें मजबूत तथा शक्तिशाली बनाया जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुसलमानों ने सिंध को अलग कराने की मांग की और उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत में उत्तरदायी सरकार गठित कराने के लिए कहा, ताकि मुसलमान चार प्रांतों पर अपना शासन कर सकें। उन्होंने प्रांतों को शक्तिशाली बनाने के लिए इस बात पर जोर दिया कि केन्द्र को कमजोर कर दिया जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के साधन स्वरूप मुसलमानों ने यह मांग की कि शेष शक्तियों को प्रांतों को दे दिया जाना चाहिए और केन्द्र में हिन्दू प्रतिनिधित्व को कम कर देना चाहिए। ब्रिटिश भारत की कुल नियत सीटों में से एक तिहाई सीटों को ही मुसलमानों को न दिया जाए, बल्कि राजाओं के लिए कुल आबंटित सीटों में से भी एक तिहाई सीटें मुसलमानों को दे दी जाएं।
हिन्दू महासभा के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने वाले हिन्दुओं को केवल एक बात की चिंता थी कि इस स्थिति का कैसे मुकाबला किया जाए, जिसे वे मुसलमानों की धमकी मानते थे। हिन्दू महासभा ने यह महसूस किया कि राज्यों का विलय हिन्दू शक्ति की अभिवृद्धि है। इसके अतिरिक्त अन्य किसी बात का उनके लिए कोई महत्व नहीं था। उनके मत के अनुसार किसी भी मूल्य पर संघ की स्थापना आवश्यक थी।
एक अन्य वर्ग भारतीय व्यापारी समुदाय है, जिसका दृष्टिकोण विचार करने योग्य है। वाणिज्यिक समुदाय निस्संदेह भारत जैसे विशाल देश में एक लघु समुदाय है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस समुदाय का दृष्टिकोण वस्तुतः किसी अन्य समुदाय के दृष्टिकोण की तुलना में अधिक निर्णायक है। यह समुदाय कांग्रेस का समर्थक रहा है। यह वही समुदाय है, जो कांग्रेस को संघर्ष के लिए संचालन - शक्ति उपलब्ध कराता है और यह जानता है कि कांग्रेस कैसे उनकी इच्छा की पूर्ति करा सकती है। व्यापारी समुदाय मुख्यतया वाणिज्यिक विभेद रुचि रखता है, और उसके साथ ही साथ विनिमय दर को भी घटाना चाहता है। यह बहुत ही संकुचित और सीमित दृष्टिकोण था। भारतीय व्यापारी समुदाय इस बात के लिए तत्पर है कि यूरोपवासियों को व्यापार और वाणिज्यि से अलग कर दिया जाए और वह उनका स्थान ले ले। उसका दावा है कि वह यह सब कुछ राष्ट्रीयता के नाम पर कर रहा है। वह चाहता है कि विनिमय दर घटा दी जाए और इस प्रकार वह अपने विदेश्ी व्यापार में लाभ उठाना चाहता है। यह भी वह राष्ट्रीयता के नाम पर करने का दावा करता है। सौदागर और व्यापार अपना ही लाभ कमाने के अतिरिक्त कोई अन्य विचार नहीं रखते।