2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 136

संघ बनाम स्वतंत्रता

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मैं कांग्रेस के बारे में क्या कहूं? उसका क्या दृष्टिकोण था? मुझे विश्वास है कि मैं तथ्यों की न तो अतिशयोक्ति कर रहा हूं और न उनके बारे में कोई भ्रम पैदा कर रहा हूं, जब मैं यह कहता हूं कि गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का दृष्टिकोण था कि कांग्रेस ही भारत में अकेली पार्टी है और अन्य किसी पार्टी ने अपना स्थान नहीं बनाया, अतः ब्रिटिश सरकार को केवल कांग्रेस से ही समझौता करना चाहिए। गोलमेज सम्मेलन में श्री गांधी के गीत की यही टेक थी। वह अपने इस दावे को स्थापित करने में ही व्यस्त रहे कि उन्हें भारत के प्रमुख के रूप में ब्रिटिश द्वारा मान्यता दी जाए और वह यह पूर्णतः भूल गए कि महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं था कि किसके साथ समझौता किया जाना चाहिए, अपितु समझौते की शर्तें क्या हैं। जहां तक समझौते की शर्तों का संबंध है, श्री गांधी अपने इस कार्य में असमर्थ रहे। जब वह लंदन गए तो वह यह भूल गए कि उनके सामने वे लोग नहीं हैं, जो उनके पास परामर्श लेने के लिए आते हैं और उनका आशीर्वाद लेकर वापस चले जाते हैं। परन्तु उनके सामने ऐसे व्यक्ति थे, जो उन्हें एक ऐसा व्यक्ति समझेंगे, जैसा कि एक अधिवक्ता जिरह कक्ष में किसी व्यक्ति को समझता है। श्री गांधी यह भी भूल गए कि वह एक राजनीतिक सम्मेलन में जा रहे थे। वह वहां ऐसे गए जैसे कि वह किसी वैष्णव मंदिर में नरसी मेहता के गीत गाते हुए जा रहे हैं। जब मैं इस पूरे प्रकरण के बारे में विचार करता हूं तो मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूं कि क्या किसी देश ने राष्ट्रीय समझौते की शर्तों पर विचार - विमर्श के लिए ऐसा प्रतिनिधि भेजा, जो श्री गांधी जैसा अयोग्य व्यक्ति हो। श्री गांधी इस समझौते में विचार - विमर्श करने के लिए कितने अयोग्य थे, यह तथ्य इस बात से स्पष्ट होता है कि कोई भी यह मूहसूस कर सकता है कि भारत का राजदूत केवल प्रांतीय स्वायत्तता का समझौता करके भारत लौटने को तैयार था, जब कि वास्तव में उन्हें स्वतंत्रता के आधार पर विचार - विमर्श के लिए भेजा गया था। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने गोलमेज सम्मेलन में भारत के हितों के लिए ऐसी दुखद स्थिति पैदा की हो, जैसी कि श्री गांधी ने पैदा कर दी थी। उनके बारे में जितना कम कहा जाए, उतना अच्छा है।

इन हितों में से प्रत्येक हित संघीय योजना से, जैसी कि आज संघीय योजना की स्थिति है, कितना संतुष्ट महसूस करता है, इसके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। फिर भी, कोई भी यह प्रश्न कर सकता है कि क्या केवल ये ही दृष्टिकोण हैं, जिन पर यह निर्णय करने के लिए विचार किया जाए कि हम इस संघ का क्या करेंगे? मैं दृढ़तापूर्वक कहता हूं कि ऊपर बताए गए दृष्टिकोणों के अलावा अन्य दृष्टिकोण भी हैं, जिनकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। स्वतंत्र व्यक्ति का भी दृष्टिकोण होता है। गरीब आदमी का भी दृष्टिकोण होता है। वे संघ के बारे में क्या कहना चाहते हैं? संघ की व्याख्या में इन लोगों की बात नहीं कही गई है, फिर भी ये ऐसे लोग हैं, जिनका इस सबसे गहन संबंध है। क्या स्वतंत्र व्यक्ति यह आशा कर सकता है कि संघीय संविधान उसकी स्वतंत्रता में एक अवरोध नहीं होगा? क्या गरीब व्यक्ति यह महसूस करता है कि संविधान पुराने मूल्यों पर पुनर्मूल्यांकन करने योग्य उसे बना सकेगा और जो विहित अधिकार