120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हैं, वे क्या घटाए जा सकेंगे? मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि यह संघ अपने अस्तित्व में आता है तो स्वतंत्र व्यक्ति के लिए यह अनवरत चलने वाला संकट हो जाएगा और गरीब व्यक्ति के मार्ग में रोड़ा बन जाएगा। ऐसी स्थिति में क्या स्वतंत्रता हो सकती है, यदि आपको राजाओं की निरंकुशता के अधीन रहना हो, क्या बेहतर आर्थिक सुधार हो सकेंगे, जब द्वितीय चैंबरों के अपने ही हित में विहित अधिकार हों और जब संपत्ति को प्रभावित करने वाले कानून को प्रस्तुत करने के पहले और उसके पारित हो जाने के बाद, दोनों ही स्थितियों में सरकार द्वारा स्वीकृति लेनी हो?
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शायद मैंने आपका इतना अधिक समय ले लिया, जितना कि मुझे नहीं लेना चाहिए था। आप मुझे यह कहने की अनुमति देंगे कि इसमें पूरी तरह मेरा ही दोष नहीं है। एक कारण यह है कि विषय विशाल था, जिसके लिए मुझे आपको अधिक समय तक संबोधित करना पड़ा।
फिर भी, मैं यह स्वीकार करता हूं कि एक अन्य कारण भी है, जिसने मुझे इस भाषण को कम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। आज हम ऐसे समय में खड़े हैं, जहां प्राचीन युग समाप्त होता है और नए युग का श्रीगणेश होता है। पुराना युग रानाडे, अगारकर, तिलक, गोखले, वाच्छा, सर फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का युग था। नया युग श्री गांधी का युग है और यह पीढ़ी गांधी की पीढ़ी कहलाती है। यदि कोई व्यक्ति पुराने युग के बारे में कुछ भी जानता है और नए युग के बारे में भी कुछ जानता है तो मैं समझता हूं कि इन दोनों में निश्चय ही अंतर है। नेतृत्व में पर्याप्त परिवर्तन आया है। रानाडे के युग में नेताओं ने भारत के आधुनिकीकरण के लिए संघर्ष किया। गांधी के युग में नेता देश को पुरातन का जीवित नमूना बना रहे हैं। रानाडे के युग में नेता अपने विचारों और कृत्यों के सुधार के उपाय के लिए अनुभव पर आश्रित रहा करते थे। आज के युग में नेता अपने मार्गदर्शक की अंतरात्मा के स्वर पर निर्भर करते हैं। उनकी विचार पद्धति में ही अंतर नहीं, अपितु बाह्य छवि से संबंधित उनके दृष्टिकोण में भी अंतर है। पुराने युग के नेता इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि वे पूर्ण परिधान धारण करें, परंतु आज के युग में नेता लोग अर्द्धनग्न रहने में आनंद उठाते हैं। गांधी युग के नेता इस अंतर से भी भली - भांति अवगत हैं। परंतु अपने दृष्टिकोण और अपनी छवि से झेंपने की बजाए दावा करते हैं कि गांधी का भारत रानाडे के भारत से अधिक श्रेष्ठ है। उनका कहना है कि श्री गांधी का युग उत्तेजना और आशा का युग है, जबकि श्री रानाडे का युग ऐसा नहीं था।
रानाडे युग और गांधी युग, दोनों में ही जो व्यक्ति रहें हैं, वे स्वीकार करते हैं कि उन दोनों युगों में अंतर है। इसके साथ ही वे इस बात पर भी बल देना चाहेंगे कि