सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 127
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इससे पूर्व कि मैं संवैधानिक प्रस्तावों को जो मेरे मस्तिष्क में हैं, ठोस रूप में प्रस्तुत
करूं, मैं दो प्रारंभिक विषय उठाना चाहता हूं। पहला विषय है : भारत का संविधान कौन
तैयार करे? इस प्रश्न का उठाया जाना इसलिए आवश्यक है कि भारत में ऐसे अनेक
लोग हैं, जिन्होंने यद्यपि यह मांग तो नहीं की है, परन्तु उन्हें यह आशा जरूर है कि
ब्रिटिश सरकार इस गतिरोध को समाप्त करके भारत के संविधान का निर्माण करेगी।
मैं सोचता हूं कि यह विचार सर्वथा भ्रामक है, जिसका भंडाफोड़ करना आवश्यक है।
ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया और भारतीयों पर थोपा गया संविधान अतीत के लिए
ही पर्याप्त था। परंतु यदि उस भावी संविधान की प्रकृति को समझा जाए जिसकी मांग
भारतीय कर रहे हैं और उस संविधान को ध्यान में रखा जाए, तो यह स्पष्ट है कि
आरोपित संविधान से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी।
भारत के पूर्वकालिक संविधानों तथा भावी संविधान में मौलिक अंतर है, और यदि
लोग अब भी भारत का संविधान तैयार करने के लिए अंग्रेजों पर विश्वास करते हैं, तो
यह लगता है कि उन लोगों ने इस अंतर को अभी तक महसूस नहीं किया है। यह अंतर
इस बात से स्पष्ट है कि पूर्वकालिक संविधानों में शासन - भंग खंड शामिल किया गया
था। परंतु भारत के भावी संविधान में इस प्रकार शासन - भंग खंड शामिल नहीं किया जा
सकता। भारत के लोग शासन - भंग खंड की निंदा करते हैं, जो कि अभी तक भारत सरकार
अधिनियम, 1935 की कुख्यात धारा 93 रही है। वे यह नहीं जानते कि इस अधिनियम में
क्यों और कैसे इस धारा को स्थान दिया गया। यदि किसी समुदाय के राजनीतिक जीवन
को प्रशासित करने वाले दो महत्वपूर्ण विचार ध्यान में रखे जाएं, तो इसका महत्व स्पष्ट हो
जाएगा। इनमें से प्रथम विचार यह है कि कानून और व्यवस्था राष्ट्र के लिए एक प्रकार
की औषधि है और जब राष्ट्र में विकार उत्पन्न हो जाए तो इस औषधि का प्रयोग किया
जाना चाहिए। वास्तव में, यह विचार इतना महत्वपूर्ण है कि यदि इस औषधि का सेवन
न कराया जाए तो इसे समाज और सभ्यता के विरुद्ध अपराध समझा जाना चाहि। दूसरा
विचार यह है कि यद्यपि यह सत्य है कि किसी भी सरकार का शासन करने का निहित
अधिकार नहीं होता, पर यह भी उतना ही सच है कि शासन करने के लिए कोई न कोई
सरकार होनी चाहिए - जिससे मेरा तात्पर्य कानून और व्यवस्था स्थापित करने से है - जब
तक कि कोई बेहतर सरकार उसका स्थान न ग्रहण करे। शासन - भंग करने वाले खंड
से इन दो उद्देश्यों की पूर्ति होती है। इस प्रकार लोगों के अमन - चैन के लिए इसका भारी
महत्व है। यही एकमात्र उपाय है, जिससे देश को अराजकता से बचाया जा सकता है,
क्योंकि जब संवैधानिक सरकार असफल हो जाती है, तब शासन - भंग करने वाले खंड में
कम से कम सरकार को बनाए रखने की क्षमता तो होती है।