3. सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय - Page 145

128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

ग त वर्षों में संवैधानिक सरकार और ऐसी सरकार में भेद व्यवहार्य समझा जाता था, जिसके लिए यह प्रावधान किया गया था कि यदि संवैधानिक सरकार असफल हो जाए तो उसके स्थान पर वह सरकार स्थान ग्रहण कर सकती है। यह व्यवहार्य था, क्योंकि एक ओर ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को संवैधानिक सरकार बनाने का अधिकार दिया था, तो दूसरी ओर उसने संवैधानिक सरकार असफल हो जाने की स्थिति में शासन करने का अधिकार अपने ही हाथ में रखा था। भारत के भावी संविधान में इस भेद को बनाए रखना संभव नहीं होगा। ब्रिटिश सरकार के लिए ही यह संभव नहीं होगा कि भारतीयों को संवैधानिक सरकार बनाने का अधिकार दिया जाए और उस स्थिति में शासन करने का अधिकार वह अपने ही हाथ में रखे, जब कि संवैधानिक सरकार भंग हो जाए। इसका कारण स्पष्ट है। भारत के गत संविधानों में भारत को औपनिवेशिक राज्य नहीं समझा गया था। भावी संविधान इस परिकल्पना पर बनाया जाएगा कि भारत एक औपनिवेशिक राज्य होगा। संवैधानिक सरकार के असफल हो जाने पर शासन - भंग

खंड अथवा सरकार के हस्तक्षेप की संभावना का समाधान उस देश में ही किया जा सकता है, जो कि औपनिवेशिक राज्य की स्थिति में न हो। लेकिन औपनिवेशिक राज्य होने पर इन दोनों में समाधान नहीं किया जा सकता। औपनिवेशिक राज्य अथवा किसी स्वतंत्र देश के मामले में या तो संवैधानिक सरकार होती है अथवा विद्रोह होता है।

इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि शासन - भंग होने की संभावना होने पर भारतीय औपनिवेशिक राज्य के लिए संविधान तैयार किया जाना असंभव है। इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि संविधान ऐसा तैयार किया जाना चाहिए कि सभी न केवल उसका पालन करें, बल्कि उसका सम्मान भी करें और सभी अथवा यदि सभी न हों तो कम से कम भारत के राष्ट्रीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण तत्व इसको बनाए रखने के लिए तैयार रहें और इसका समर्थन करें। यह तभी हो सकता है, जब संविधान भारतीयों द्वारा भारतीयों के लिए तैयार किया जाए और इस कार्य के लिए भारतीयों की स्वैच्छिक अनुमति ली जाए। यदि संविधान ब्रिटिश सरकार द्वारा आरोपित किया जाता है और इसे कोई एक वर्ग स्वीकार करता है और दूसरा वर्ग उसका विरोध करता है, तो देश में एक ऐसा तत्व उभरेगा, जो संविधान के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपनाएगा और उसकी शक्ति संविधान को लागू करने की बजाए उसे भंग करने में लग जाएगी। संविधान विरोधी दल संविधान को नष्ट करना ही अपना कर्तव्य समझेगा और वह वास्तविक लैटिन अमरीकी शैली में संविधान लागू करने वाले दल के विरुद्ध प्रचार करने में ही व्यस्त रहेगा।

ब्रिटिश शासकों द्वारा भारत के लिए संविधान बनाना निरर्थक है, क्योंकि वे उस संविधान को लागू करने के लिए यहां रहेंगे ही नहीं। एक सशक्त वर्ग द्वारा अथवा ऐसे ही अन्य वर्गों के समूह द्वारा अन्य वर्गों पर संविधान को आरोपित करने का भी यही परिणाम होगा। इसलिए मेरा यह दृढ़ मत है कि यदि भारतीय औपनिवेशिक राज्य का दर्जा चाहते हैं, तो वे अपने संविधान निर्माण के अपने दायित्व से बच नहीं सकते। इस प्रकार यह स्थिति अपरिहार्य है।