134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
क्रिप्स प्रस्तावों में बहुमत के नियम को अपनाने के लिए यह सफाई दी गई है कि अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की सुरक्षा के लिए कुछ और व्यवस्था की जानी है। इस व्यवस्था को, इससे पूर्व कि संसद अपनी प्रभुसत्ता का परित्याग करके भारत को स्वतंत्रता दे, ब्रिटिश सम्राट और भारतीय संविधान सभा के बीच एक संधि का रूप लेना था। इस संधि के प्रस्ताव का तभी अर्थ होता, जबकि संधि संविधान पर अभिभावी होती। परंतु इस प्रस्ताव को कार्यान्वित किया जाना असंभव था, क्योंकि क्रिप्स योजना के अंतर्गत भारत को अपनी इच्छानुसार औपनिवेशिक राज्य अथवा स्वतंत्र देश होने की स्वतंत्रता दी गई थी। यदि भारत औपनिवेशिक राज्य बन जाता है तो वह स्वतः उस समस्त वैधिक शक्ति को प्राप्त कर लेगा, जिसे अधिनियम घोषित करने का अधिकार होगा कि संधि संविधान पर अभिभावी नहीं होगी। ऐसी स्थिति में यह संधि उस कैलेंडर के समान होती, जिसे अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य इच्छानुसार अपने घरों की दीवारों पर टांग लेते। यह वही स्थिति है, जो आयरलैंड की संधि की हुई थी। आयरिश संधि आयरलैंड के संविधान पर तब तक अभिभावी रही, जब तक कि आयरलैंड औपनिवेशिक राज्य नहीं बन गया। परंतु ज्यों ही आयरलैंड औपनिवेशिक राज्य बना, संधि की शक्ति स्वतंत्र आयरलैंड के राज्य की संसद ने एक संक्षिप्त तथा साधारण अधिनियम पारित करके समाप्त कर दी और ब्रिटिश संसद कुछ भी न कर पाई, क्योंकि ब्रिटिश संसद को यह मालूम था कि आयरलैंड एक औपनिवेशिक राज्य है और इसीलिए वह कुछ नहीं कर सकती। मेरी समझ में यह नहीं आता कि अल्पसंख्यक वर्ग को आश्वस्त करने के लिए इतने प्रतिष्ठित व्यक्ति ने इतना बेतुका प्रावधान किस तरह प्रस्तुत कर दिया।
सप्रू प्रस्तावों में की गई व्यवस्थाएं कुछ बेहतर जान पड़ती हैं। परंतु क्या वास्तव में स्थिति में उनसे कोई सुधार हुआ? मेरा विश्वास है कि उनसे कोई सुधार नहीं हुआ है। 160 के तीन चौथाई बहुमत का अर्थ यह है कि यदि किसी विचार को स्वीकार कराना है, तो 120 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता है। इससे पूर्व कि उसे सुधार के रूप में स्वीकार किया जाए, यह जानना आवश्यक है कि 120 सदस्यों के इस दल को गठित करने की क्या संभावना है। यदि हिन्दू और मुसलमान मिल जाते हैं तो वे 102 सदस्यों का दल बना लेंगे, और इस संख्या को 120 करने के लिए केवल 18 सदस्यों की आवश्यकता होगी। अधिकांश विशेष सीटें तथा कुछ और अन्य सीटें इस गठबंधन के हाथों में आसानी से आ जाएंगी। यदि ऐसा हो जाता है तो संविधान सभा का निर्णय स्पष्ट रूप से अनुसूचित जातियों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, आदि पर थोपा हुआ माना जाएगा। यदि मुसलमानों को अलग कर दिया जाता है तो यह निर्णय संयुक्त निर्णय नहीं होगा, बल्कि गैर - मुसलमानों द्वारा मुसलमानों पर आरोपित किया जाएगा। मुझे
खेद है कि सप्रू समिति ने कुछ समुदायों द्वारा दूसरों को हराने अथवा चकमा देने के प्रयोजन से क्रम परिवर्तन और संयोजन की संभावनाओं पर विचार नहीं किया है। यदि सप्रू समिति यह व्यवस्था देती कि तीन चौथाई बहुमत में प्रत्येक वर्ग का कम से कम 50 प्रतिशत भाग शामिल होगा, तो कुछ न कुछ सुरक्षा हो जाती।