सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 135
संयुक्त राज्य में संविधान तैयार करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए सप्रू समिति को एक उपबंध भी जोड़ना चाहिए था ताकि सभा के बाहर अल्पसंख्यक वर्ग के प्रतिनिधियों द्वारा सभा के निर्णय के कम से कम संप्रदायिक भाग को किसी भी दशा में अभिपुष्टि संभव हो जाती। सप्रू समिति ने संविधान सभा के लिए जो योजना बनाई है, उसमें इस प्रकार का कोई उपबंध नहीं है। इसके फलस्वरूप संविधान सभा केवल एक मजाक बनकर रह गई है।
संविधान सभा की योजना के विरुद्ध अन्य अनेक तर्क है। मैं एक तर्क प्रस्तुत करता हूं और यह स्वीकार करता हूं कि इसी ने मुझे अधिक प्रभावित किया है। जब मैंने स्कॉटलैंड और इंग्लैंड के बीच संघ के इतिहास का अध्ययन किया, मुझे स्कॉटलैंड की संसद को जीतने के लिए भ्रष्ट तरीकों और रिश्वत का इस्तेमाल किये जाने पर बहुत दुख हुआ। संपूर्ण स्कॉटलैंड संसद को खरीद लिया गया। निहित स्वार्थों द्वारा वांछित निर्णयों के लिए भारतीय संविधान सभा में भ्रष्ट तरीकों से सदस्यों को खरीदने की संभावनाएं अधिक वास्तविक लगती हैं। मेरा विश्वास है कि उसके प्रभावों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि ऐसा होता है तो संविधान सभा न केवल उपहास का विषय बन जाएगी, बल्कि मुझे तो पक्का विश्वास है कि उसके निर्णयों को लागू करने से गृहयुद्ध छिड़ जायेगा। यह मेरा सुविचारित मत है कि संविधान सभा का प्रस्ताव लाभ तो क्या पहुंचाएगा, उससे
खतरे और बढ़ जाएंगे और इसलिए इसकी उपेक्षा की जानी चाहिए।
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नवीन दृष्टिकोण की आवश्यकता
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मुझसे यह पूछा जाएगा कि यदि संविधान सभा के पक्ष में मत देना सही दृष्टिकोण नहीं है तो इसका विकल्प क्या है? मैं जानता हूं कि मुझसे यह प्रश्न पूछा जाएगा। परंतु मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि सांप्रदायिक समस्या का समाधान करना कठिन है, तो इसका कारण यह नहीं है कि इसका समाधान हो ही नहीं सकता और न ही इसका यह कारण है कि हमने संविधान सभा की मशीनरी को अभी तक इस काम में नहीं लगाया है। इसका समाधान इसलिए नहीं हो सकता है कि उसके प्रति जो दृष्टिकोण अपनाया गया है, वह बुनियादी रूप से गलत है। वर्तमान दृष्टिकोण में यह दोष है कि यह सिद्धांतों की अपेक्षा व्यवहार को महत्व देता है। वास्तव में कोई सिद्धांत है ही नहीं। तरीकों की ही भरमार है। यदि एक तरीका असफल हो जाता है तो दूसरा तरीका काम में लाया जाता है। एक तरीके से दूसरे तरीके तक जो छलांग लगाई जाती है, उससे सांप्रदायिक समस्या असाध्य बन जाती है। चूंकि कोई सिद्धांत है ही नहीं, अतः कोई ऐसा आश्वासन नहीं दिया जा सकता कि नया तरीका सफल होगा ही।
सांप्रदायिक समस्या के समाधान का प्रयत्न करना या तो किसी कायर की योजना है जो धौंस जमाने वाले के पीछे चलता है, अथवा यह किसी धौंसिए की योजना है जो दुर्बल पर हुक्म चलाता है। जब कभी कोई समुदाय सशक्त हो जाता है तथा कुछ