136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
राजनीतिक लाभ मांगता है तो उसे कुछ रियायतें दे दी जाती हैं, ताकि उसकी सद्भावना प्राप्त हो जाए। उसके दावे की न्यायिक जांच नहीं की जाती, और न ही गुणों के आधार पर कोई निर्णय हो पाता है। इसका परिणाम यह होता है कि न तो मांगों की कोई सीमा रहती है और न ही रियायतों की। इसकी शुरूआत अल्पसंख्यक वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक - मंडल की मांग से की जाती है। यह मांग मान ली जाती है। इसके बाद किसी समुदाय विशेष के लिए पृथक निर्वाचक - मंडल की मांग की जाती है और उस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता कि वह समुदाय अल्पसंख्यक वर्ग का है या बहुसंख्यक वर्ग का। यह मांग भी स्वीकार कर ली जाती है। इसके बाद जनसंख्या के आधार पर पृथक प्रतिनिधित्व की मांग की जाती है। इसे भी मान लिया जाता है। फिर प्रतिनिधित्व में वरीयता का दावा किया जाता है और वह भी स्वीकार कर लिया जाता है। तत्पश्चात् पृथक निर्वाचन - क्षेत्र के अधिकार को बनाए रखने के साथ अल्पसंख्यक वर्गों के ऊपर संवैधानिक बहुसंख्यक वर्ग की मांग की जाती है। इसकी भी स्वीकृति दे दी जाती है। इसके बाद यह आवाज उठाई जाती है कि बहुसंख्यक वर्ग का अन्य समुदाय पर शासन असहनीय है और इसलिए बहुसंख्यक वर्ग के अन्य अल्पसंख्यक वर्ग पर शासन बनाए रखने के उसके अधिकारों पर विपरीत प्रभाव डाले बिना आघात करने वाले समुदाय का मत समाप्त करके उसे बराबरी पर ले आना चाहिए। इस अनवरत तुष्टीकरण की नीति से बढ़कर बेतुकी बात और क्या हो सकती है? यह एक ऐसी नीति है, जिसमें मांगों की कोई सीमा नहीं होती और जिसका परिणाम भी अनंत तुष्टीकरण होता है।
स्पष्ट कहा जाए तो मैं उस समुदाय को दोष नहीं देना चाहता, जो यह रणनीति अपनाता है। यह समुदाय इस रणनीति को इसलिए अपनाता है कि इससे उसे लाभ पहुंचता है। यह इसका अनुसरण इसलिए करता है कि सीमाएं निर्धारित करने के लिए कोई नियम नहीं है और उसका विचार है कि कानूनी तौर पर अधिक मांग की जा सकती है और उसे आसानी से पूरा कराया जा सकता है। दूसरी ओर एक अन्य समुदाय है, जो आर्थिक रूप से गरीब है, सामाजिक रूप से अवनत है, शैक्षिक रूप से पिछड़ा हुआ है और जिसका निर्लज्जता के साथ और पश्चात्ताप किए बिना शोषण किया जाता है, दमन किया जाता है तथा जिस पर अत्याचार किया जाता है। समाज इस समुदाय का बहिष्कार करता है, सरकार उसे अपना नहीं मानती तथा जिसके पास अपने संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है और इसे न्याय, ईमानदारी तथा समान अवसर दिलाने के लिए कोई गारंटी नहीं दी जाती। ऐसे समुदाय से कहा जाता है कि वह कोई सुरक्षा - साधन नहीं रख सकता। इसका कारण यह नहीं है कि उसे किसी सुरक्षा - साधन की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे पुराने धमकाने वाले व्यक्तियों का जिन पर अधिकारों का विधेयक प्रस्तुत किया जाता है, विचार है कि समुदाय राजनीतिक रूप से संगठित नहीं है कि वह अपनी मांग के लिए समर्थन पा सके, अतः उसे सफलतापूर्वक डराया - धमकाया जा सकता है।
यह सारा भेदभावपूर्ण व्यवहार इस बात का परिणाम है कि कोई ऐसे सिद्धांत निर्धारित