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सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 137

नहीं किए गए हैं, जो अधिकृत हों तथा उन लोगों पर लागू हों, जो सांप्रदायिक प्रश्न में शामिल हों। सिद्धांतों के अभाव का एक और हानिकारक प्रभाव होता है। इसके कारण लोकमत के लिए अपनी भूमिका निभाना असंभव हो गया है। जनता केवल तरीके जानती है तथा यह समझती है कि एक तरीका असफल हो गया है और दूसरा सुझाया जा रहा है। जनता को यह ज्ञात नहीं होता कि एक तरीका असफल क्यों हो गया और दूसरे तरीके के लिए क्यों कहा जाता है कि उसके सफल होने की संभावना है। इसका परिणाम यह होता है कि जनता संगठित होकर दुराग्रही तथा हठी दलों को विवेक से काम लेने के लिए बाध्य करने की बजाय सांप्रदायिक प्रश्नों पर हो रही चर्चा को, जहां भी वह हो रही हो, केवल दर्शक बनकर देखती रहती है।

इसलिए मैं सांप्रदायिक समस्या के समाधान के लिए जो दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रहा हूं, वह इन दो विचारों पर आधारित हैं :

(1) सांप्रदायिक समस्या के समाधान की दिशा में बढ़ने के लिए आवश्यक है कि

उन शासी सिद्धांतों की परिभाषा दी जाए, जिसका आह्वान अंतिम समाधान

को सुनिश्चित करने के लिए किया जा सके, और

(2) शासी सिद्धांत कुछ भी क्यों न हो, वे सभी पक्षों पर भय अथवा पक्षपात के

बिना समान रूप से लागू किए जाने चाहिए। 5

सांप्रदायिक समस्या के समाधन के लिए प्रस्ताव
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मैंने कतिपय प्रारंभिक मुद्दों के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है और अब मैं इस विषय पर चर्चा करना चाहूंगा।

सांप्रदायिक समस्या से तीन प्रश्न उभरते हैं :

(1) विधान-मंडल में प्रतिनिधित्व का प्रश्न,

(2) कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व का प्रश्न, और

(3) लोक सेवाओं में प्रतिनिधित्व का प्रश्न।

लोक सेवाओं में प्रतिनिधत्व

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अंतिम प्रश्न पर सबसे पहले चर्चा कर ली जाए। इसे विवादास्पद प्रश्न नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार ने यह स्वीकार कर लिया है कि सैद्धांतिक रूप से सभी समुदायों को लोक सेवाओं में निर्धारित अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए और किसी भी एक समुदाय को एकाधिकार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस सिद्धांत का समावेश भारत सरकार के 1934 और 1943 के प्रस्ताव में कर लिया गया है और इसे कार्यान्वित किए जाने के लिए नियम बिना दिए गए हैं। यह भी निर्धारित किया गया है कि यदि इन नियमों के विरुद्ध कोई नियुक्ति की जाती है तो उसे रद्द माना जाएगा। केवल इतना ही आवश्यक