3. सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय - Page 165

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मेरी योजना के पक्ष में हैं। वे मुद्दे इस प्रकार हैं :

(1) मेरे प्रस्ताव के अंतर्गत सांप्रदायिक बहुसंख्यक वर्ग का खतरा, जिसके आधार पर

पाकिस्तान का निर्माण होना है, हटा दिया जाए।

(2) मेरे प्रस्ताव के अंतर्गत इस समय मुसलमान जो लाभ उठा रहे हैं, उसे न छेड़ा

जाए।

(3) गैर - पाकिस्तानी प्रांतों में मुसलमानों की स्थिति उनके प्रतिनिधित्व में वृद्धि

करके बहुत मजबूत कर दी गई है, जिसे वे पाकिस्तान बन जाने पर प्राप्त नहीं

कर सकते हैं और उनकी स्थिति इस समय के अपेक्षाकृत अधिक दयनीय हो

जाएगी।

11
Col1 d
p rs ko u

सांप्रदायिक प्रश्न की सबसे बड़ी कठिनाई हिन्दुओं का इस बात पर जोर देना है कि बहुमत का शासन पवित्र है और इसे हर हालत में बनाए रखना है। हिन्दू इस तथ्य से अवगत नहीं हैं कि एक अन्य प्रकार का भी नियम होता है जो ऐसे क्षेत्रों में प्रचलित है, जहां व्यक्ति और देश के बीच महत्वपूर्ण विवाद उठते हैं और जहां सर्वसम्मति का नियम ही नियम माना जाना है। यदि वे उस स्थिति की जांच करने का कष्ट उठाएं तो वे यह महसूस करेंगे कि इस प्रकार का नियम कोई कापोल - कल्पित नहीं है, परंतु इसका अस्तित्व है। उन्हें जूरी - पद्धति का ही उदाहरण लेना चाहिए। जूरी में जांच सर्वसम्मति के सिद्धांत पर आधारित होती है। इसका निर्णय न्यायाधीश के लिए तभी बाध्यकारी होता है, जब जूरी ने सर्वसम्मति से निर्णय किया हो। एक अन्य उदाहरण लीग ऑफ नेशन्स का दिया जा सकता है। लीग ऑफ नेशन्स में निर्णयों का क्या नियम था? वह नियम सर्वसम्मति का था। यह स्पष्ट है कि यदि हिन्दुओं द्वारा सर्वसम्मति का नियम विधान-मंडल तथा कार्यपालिका में निर्णय लेने के लिए स्वीकार कर लिया जाए तो भारत में सांप्रदायिक समस्या जैसी कोई वस्तु नहीं होगी।

यह बात किसी हिन्दू से पूछी भी जा सकती है कि यदि वह अल्पसंख्यक वर्गों को संवैधानिक सुरक्षा देने के लिए सहमति नहीं देता है, तो क्या वह सर्वसम्मति के नियम के लिए सहमत है? दुर्भाग्यवश वह दोनों में से किसी बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

बहुसंख्यक वर्ग के शासन के बारे में हिन्दू किसी प्रकार की सीमा को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। वह ऐसा बहुमत चाहता है, जो पूर्ण बहुमत हो। उसे सापेक्ष बहुमत से संतोष नहीं होगा। उसे यह सोचना चाहिए कि क्या पूर्ण बहुमत के बारे में उसका आग्रह उचित है, जिसे राजनीति के पंडित स्वीकार कर सकें। वह इस तथ्य से अवगत