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सांप्रदायिक गतिरोध और उसके समाधान के उपाय 149

नहीं है कि अमरीका का संविधान भी बहुमत के एकाधिपत्य वाले शासन का समर्थन नहीं देता, जबकि हिन्दू उस बारे में बराबर आग्रह कर रहे हैं।

मैं इस बात को अमरीका के संविधान का उदाहरण देकर समझाना चाहूंगा। मौलिक अधिकारों का खंड ले लीजिए। इस खंड का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि जो मामले मौलिक अधिकारों में सम्मिलित किए गए हैं, वे इतनी गहरी चिंता के विषय हैं कि केवल बहुसंख्यक वर्ग का शासन ही उनमें हस्तक्षेप करने के लिए पर्यापत नहीं है। अमरीका के संविधान से एक अन्य उदाहरण लिया जाए। उसमें यह प्रावधान किया गया है कि संविधान के किसी भाग में उस समय तक परिवर्तन नहीं किया जा सकता, जब तक तीन चौथाई बहुमत प्रस्ताव की स्वीकृति न दे दे और यह प्रस्ताव राज्यों द्वारा अनुमोदित न करा लिया जाए। इसका क्या अभिप्राय है? इसका अभिप्राय है कि अमरीका के संविधान में कतिपय प्रयोजनों के लिए केवल बहुमत के शासन को ही सक्षम नहीं माना गया है।

इन सभी मामलों से अनेक हिन्दू अलबत्ता परिचित हैं। दुख इस बात का है कि वे उनसे सही पाठ नहीं सीखते। यदि वे ऐसा करें तो उन्हें यह महसूस होगा कि बहुमत के शासन का नियम उतना पवित्र नहीं है, जितना वे उसे समझते हैं। बहुमत के शासन को एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता बल्कि उसे एक नियम के रूप में मान लिया जाता है। मैं यह भी बताना चाहूंगा कि उसे क्यों मान लिया जाता। उसे दो कारणों से मान लिया जाता है : (1) बहुमत सदैव राजनीतिक बहुमत होता है, और (2) राजनीतिक बहुमत का निर्णय अल्पमत के दृष्टिकोण को उस सीमा तक स्वीकार और आत्मसात कर लेता है कि वह इस निर्णय के विरुद्ध विद्रोह करने की चिंता ही नहीं करता।

भारत में बहुमत राजनीतिक बहुमत नहीं होता। भारत में बहुमत पैदा होता है, इसका निर्माण नहीं किया जाता। सांप्रदायिकता बहुमत तथा राजनीतिक बहुमत में यही अंतर है। कोई भी राजनीतिक बहुमत स्थिर या स्थायी नहीं होता। यह केवल बहुमत ही है, जिसका सदैव निर्माण, खंडन और पुनर्निर्माण किया जाता है। सांप्रदायिक बहुमत स्थायी और इसका दृष्टिकोण स्थिर होता है। कोई भी उसका विनाश कर सकता है, परंतु उसका रूपांतरण नहीं कर सकता। यदि राजनीतिक बहुमत के लिए इतनी अधिक आपत्ति है, तो सांप्रदायिक बहुमत के लिए आपत्ति कितनी विनाशकारी होगी?

हिन्दू श्री जिन्ना से पूछ सकते हैं कि 1930 में उन्होंने 14 मुद्दे तैयार किये थे, तब उन्होंने बहुमत के शासन के सिद्धांत पर इस सीमा तक क्यों बल दिया था कि 14 मुद्दों में से एक मुद्दे की शर्त यह थी कि वरीयता प्रदान करते समय सीमाएं तय कर लेनी चाहिएं, जिससे बहुमत अल्पमत अथवा उसके समान न हो जाए। हिन्दू श्री जिन्ना से पूछ सकते हैं कि जब वह मुसलमानों के प्रांतों में मुसलमानों के बहुमत के पक्ष में हैं, फिर केन्द्र में वह हिन्दू बहुमत का विरोध क्यों करते हैं? परन्तु हिन्दुओं को यह महसूस करना चाहिए कि इन प्रश्नों का यह अभिप्राय हो सकता है कि श्री जिन्ना की स्थिति में परस्पर विरोध है।