164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
किसी भी व्यक्ति को किसी धार्मिक संघ का सदस्य बनने, किसी धार्मिक शिक्षा को स्वीकार करने या धर्म का कोई कृत्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। पूर्ववर्ती उपबंध के अधीन रहते हुए माता - पिता और संरक्षक 16 वर्ष की आयु तक के बालकों की धार्मिक शिक्षा निर्धारित करने के लिए हकदार होंगे।
कोई भी व्यक्ति अपनी जाति, पंथ या धर्म के कारण किसी भी प्रकार का जुर्माना उपगत नहीं करेगा और न ही किसी व्यक्ति को जाति, पंथ या धर्म के आधार पर नागरिकता की कोई बाध्यता पूरी करने से इंकार करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा।
राज्य किसी भी धर्म को राजधर्म के रूप में मान्यता नहीं देगा।
किसी भी धर्म के अनुयायी लोगों को संगम - स्वातंत्र्य की गारंटी दी जाएगी और यदि वे चाहें तो उन्हें एक निगमित निकाय बनाने के लिए उनके द्वारा अनुमोदित रूप में विधान पारित करने के लिए राज्य की मांग करने का अधिकार होगा।
प्रत्येक धार्मिक संगम सब पर लागू विधियों को सीमाओं के अंतर्गत अपने कार्यों को विनियमित और प्रशासित करने के लिए स्वतंत्र होगा।
धार्मिक संगम अपने सदस्यों से, जो देने के इच्छुक हैं, अंशदान लेने के लिए हकदार होंगे, यदि उनकी निगमन विधि उन्हें ऐसा करने की अनुमति देती है। किसी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिनके आगमों का विनिर्दिष्ट तौर पर विनियोजन ऐसे धार्मिक समुदाय के उपयोग के लिए किया जाए, जिसका वह सदस्य नहीं है।
इस अनुभाग के अंतर्गत सभी अपराध संज्ञेय समझे जाएंगे। संघ विधान - मंडल ऐसे उपबंधों को प्रभावी रूप देने के लिए जो उस प्रयोजन के लिए विधान की अपेक्षा करते हैं, और अपराधों के रूप में घोषित किए गए कृत्यों के लिए दंड विहित करने के हेतु विधियां बनाएगा।
अनुच्छेद 2 - अनुभाग 2
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अनुच्छेद 2
अनुभाग 2
मूल अधिकारों पर आक्रमण के विरुद्ध उपचार
संयुक्त राज्य भारत उपबंध करेगा :
खंड 1
भारत की न्यायिक शक्ति उच्चतम न्यायालय में निहित होगी।
उच्चतम न्यायालय को अन्य सब न्यायालयों और न्यायालय की शक्तियों का
कार्यकारी के अत्याचार के विरुद्ध न्यायिक संरक्षण (स्पष्टीकरण के
लिए (देखिए, पृष्ठ 191)
प्रयोग करने वाले अधिकारियों पर अधीक्षण की शक्ति होगी - चाहे ऐसे न्यायालय या अधिकारी उसकी अपीली या पुनरीक्षण अधिकारिता के अधीन हों अथवा नहीं।