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राज्य और अल्पसंख्यक

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  1. उच्चतम न्यायालय को पीडि़त पक्ष के आवेदन पर परमाधिकार रिट जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, अधिकार पृच्छा प्रतिबंध, आदेशपत्र और परमादेशपत्र, आदि रिट जारी करने की शक्ति होगी। ऐसे रिटों के प्रयोजन के लिए उच्चतम न्यायालय संपूर्ण भारत में साधारण अधिकारिता का न्यायालय होगा।

  2. रिट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब तक कम या निलंबित नहीं किया जाएगा, जब तक कि राजद्रोह या आक्रमण की स्थिति में लोक - सुरक्षा के लिए ऐसा अपेक्षित न हो।

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असमान व्यवहार से संरक्षण

(स्पष्टीकरण के लिए देखिए, पृष्ठ 191.193)

संघ एवं समस्त भारत के प्रत्येक राज्य के विधान - मंडल और कार्यपालिका का प्राधिकार निम्नलिखित परिसीमाओं के अधीन रहेगा :

भारत में कोई भी विधान - मंडल अथवा कार्यपालिका ऐसी विधि पारित करने या आदेश, नियम या विनियम जारी करने के लिए सक्षम नहीं होगी, जो राज्य की जनता के निम्नलिखित अधिकारों का उल्लंघन करते हों :

  1. संविदा करना और उन्हें लागू करना, मुकदमा चलाना, पक्ष बनना और साक्ष्य देना,

चलन और निजी संपत्ति को विरासत में पाना, खरीदना, पट्टे पर देना, बेचना,

धारण करना और हस्तांतरित करना।

  1. असैनिक और सैनिक सेवा में तथा समस्त शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश के लिए पात्र

होना : परंतु इस पर ऐसी शर्तें और परिसीमाएं लगाई जा सकती हैं, जो राज्य की

जनता के सभी वर्गों के सम्यक् और पर्याप्त प्रतिनिधित्व के लिए आवश्यक हैं। 3. आवास - सुविधाओं, फायदों, सुविधाओं, शिक्षा संस्थाओं, सरायों, नदियों, झरनों,

कुओं, तालाबों, सड़कों, पथों, गलियों, भूमि, वायु और जल पर सार्वजनिक वाहनों,

थियेटरों तथा लोक - समागम या मनोरंजन के अन्य स्थानों के विशेषाधिकारों का

ऐसी शर्तें और परिसीमाएं के अधीन रहते हुए पूर्ण और समान उपयोग के लिए

हकदार होना हो जो हर मूलवंश, वर्ग, जाति, रंग या पंथ के सभी लोगों के लिए

एक - सी लागू हों।

  1. जनसाधारण के लिए अथवा उसी मत और धर्म के लोगों के लिए समर्पित या

सर्जित; अनुरक्षित या लाइसेंस प्राप्त किसी धार्मिक या खैराती न्यास की सुविधाओं

का बिना भेदभाव लाभ उठाने के लिए उपयुक्त और समर्थ समझा जाना। 5. अन्य लोगों की भांति व्यक्तियों और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए समस्त विधियों

और कार्यवाहियों का पूर्ण और समान रूप से लाभ उठाने का दावा करना, चाहे

कोई भी प्रथा या रूढि़ अथवा धर्म पर आधारित प्रथा या रूढि़ हो और समान

दंड, कष्ट और जुर्माने का भागी होना और अन्य किसी का नहीं।