176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अनुच्छेद 1 . अनुभाग 1
खंड 1 से खंड 4
छह सौ से अधिक देशी राज्यों के संघ में शामिल होने के अनेक जटिल प्रश्न उत्पन्न हुए हैं। उनमें सबसे कठिन प्रश्न है संघ में उनके प्रवेश के बारे में। प्रत्येक देशी राज्य प्रभुतव संपन्न राज्य होने का दावा कर रहा है और स्वयं के अधिकार से संघ में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है। आकार, जनसंख्या, राजस्व और संसाधनों की दृष्टि से देशी राज्यों के अलग - अलग वर्ग हैं। स्पष्ट है कि राज्य के रूप में संघ में शामिल प्रत्येक राज्य के पास अपनी निजी सीमाओं के भीतर शांति कायम रखने, आधुनिक प्रशासन का भार वहन करने और अपने लोगों के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक संसाधन रखने की सामर्थ्य हो, अन्यथा अनेक कमजोर राज्यों का भार संयुक्त राज्य भारत पर पड़ने की संभावना है। वे केन्द्रीय सरकार के लिए सहायक होने की बजाय उस पर बोझ बन जाएंगे। अपनी इकाइयों के रूप में ऐसे छोटे और कमजोर राज्यों वाली केन्द्रीय सरकार आपातकाल में कभी भी अपनी गाड़ी नहीं खींच पाएगी। अतः यह स्पष्ट है कि यदि प्रत्येक देशी राज्य को आधुनिक प्रशासन तथा आंतरिक शांति कायम रखने का भार वहन करने की उसकी सामर्थ्य का निरीक्षण किए बिना संघ में शामिल कर लिया गया, तो भारत की भावी सुरक्षा के लिए भारी खतरा हो जाएगा। इस खतरे से बचने के लिए इस अनुच्छेद के अंतर्गत देशी राज्यों को दो वर्गों में बांटा गया है : (1) अर्हित देशी राज्य, और (2) अनर्हित देशी राज्य। इसमें प्रस्तावित है कि देशी राज्यों को संघ में शामिल करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में सर्वप्रथम अर्हित देशी राज्यों की एक सूची तैयार की जाए। अर्हित देशी राज्य को संघ में प्रवेश आवेदन करने पर तथा समर्थकारी अधिनियम के उपबंधों की पूर्ति पर दिया जाएगा। संघ विधान-मंडल उस राज्य में स्थापित आंतरिक शासन की अपेक्षा करने के प्रयोजन के लिए ऐसा अधिनियम पारित करने के लिए प्राधिकृत है। वह संयुक्त राज्य भारत के संविधान में अंतर्निहित सिद्धांतों के अनुरूप होगा। अनर्हित देशी राज्यों के आधिपत्य वाला राज्य - क्षेत्र संयुक्त राज्य भारत का राज्य - क्षेत्र माना जाएगा और उसे संयुक्त राज्य भारत द्वारा उपयुक्त आकार के राज्यां में पुनर्गठित किया जाएगा। इस बीच में इन क्षेत्रों के शासक इन क्षेत्रों पर संयुक्त राज्य भारत के निरीक्षण के अंतर्गत शासन करते रहेंगे। अधिनियम द्वारा यह भी घोषणा की गई है कि भारतीय राज्य - क्षेत्र चाहे वह ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के आधिपत्य में हो या देशी राज्यों के, एक अखंड राज्य - क्षेत्र होगा और तब भी ऐसा ही होगा जब कोई देशी राज्य संघ में शामिल न हो।
खंड 4 में उपबंध किया गया है कि जब एक बार कोई राज्य संघ में शामिल कर लिया जाए तो उसकी अखंडता कायम रखी जाएगी और उसे इस खंड में शामिल उपबंधों के अन्यथा उपखंडों में नहीं बांटा जाएगा।