4. राज्य और अल्पसंख्यक - Page 194

राज्य और अल्पसंख्यक

177

अनुच्छेद 1 - अनुभाग 2

[k aM

अनुच्छेद 1

अनुभाग 2

खंड 1 और खंड 2

खंड 1 संयुक्त राज्य भारत को उन राज्यों को सम्मिलित करने की अनुज्ञा देता है, जो स्वाधीन हैं, किन्तु सीमा पर स्थित हैं और संघ में शामिल होना चाहते हैं।

खंड संयुक्त राज्य भारत को कोई राज्य - क्षेत्र में अर्जित करने तथा उसे सम्मिलित करने या एक पृथक राज्य - क्षेत्र के रूप में मानने की अनुज्ञा देता है।

अनुच्छेद 2 - अनुभाग 1 अनुच्छेद 2

अनुभाग 1

संविधान में मूल अधिकारों को शामिल करने के लिए किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। मूल अधिकारों की आवश्यकता सभी नए - पुराने संविधानों में मान्य रही है। इस अनुच्छेद में शामिल मूल अधिकार विभिन्न देशों, विशेषकर उन देशों के जहां कामोवेश भारत जैसी अवस्थाएं हैं, संविधानों से लिए गए हैं।

अनुच्छेद 2 - अनुभाग 2 अनुच्छेद 2

अनुभाग 2

खंड 1

अधिकार तभी वास्तविक होते हैं, जब उनके साथ उपचार भी हों। यदि पीडि़त व्यक्ति को अपने अधिकारों का अतिक्रमण किए जाने पर कोई कानूनी उपचार प्राप्त नहीं है, तो अधिकार प्रदान करना बेकार है। परिणामस्वरूप, जब संविधान अधिकारों की गारंटी देता है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि विधायिका और कार्यपालिका को उन पर हावी होने से रोकने के लिसए उपबंध किया जाए। यह काम प्रायः न्यायपालिका को सौंपा जाता है और न्यायालयों को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का विशेष संरक्षक बनाया गया है। इस खंड का इससे अधिक और कोई काम नहीं है। इस खंड के अंतर्गत कार्यपालिका द्वारा प्राधिकार के दुरुपयोग के खिलाफ न्यायपालिका को छानबीन करने की कुछ शक्तियों से लैस करके नागरिकों को कार्यपालिका के अत्याचार से संरक्षण प्रदान करना प्रस्तावित है। यह शक्ति रिट जारी करने के रूप में होगी। भारत में उच्च न्यायालय को भारत सरकार अधिनियम और उनके अधिकार - लेखों के अधीन ये शक्तियां प्राप्त हैं, किन्तु इन शक्तियों पर दो पाबंदियां हैं। प्रथम, अधिकार - लेखों द्वारा प्रदत्त शक्तियां प्रेसिडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों को ही प्राप्त हैं, न कि सबको। दूसरे, ये शक्तियां केन्द्रीय विधान - मंडल द्वारा बनाई गई विधियों के अधीन हैं। तीसरे, भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा प्रदत्त शक्तियां सीमित हैं और संभवतः वे पीडि़त व्यक्ति को संरक्षण देने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हों। इस खंड के दो उद्देश्य हैं- (1) न्यायपालिका को वे रिट जिन्हें आंगल विधि के अंतर्गत परमाधिकार रिट कहते हैं, जारी करने की पूरी शक्ति देना, तथा (2) इन शक्तियों को किसी भी तरह कम करने से विधान-मंडल को रोकना।