180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
को भी अपनी आर्थिक योजना के वित्त प्रबंध के लिए आवश्यक संसाधन मिल जाते हैं। अन्यथा राज्य की ऊंची ब्याज दर पर बाजार से धन उधार लेना पड़ेगा। भारत का तेजी से औद्योगीकरण करने के लिए राजकीय समाजवाद अनिवार्य है। निजी उद्यम ऐसा नहीं कर सकता और यदि कर सकता है तो भी वह संपदा की विषमताओं को जन्म देगा, जो निजी पूंजीवाद ने यूरोप में पैदा की है और जो भारतीयों के लिए एक चेतावनी होगी। चकबंदी और काश्तकारी विधान व्यर्थ से भी बदतर हैं। उनसे कृषि - क्षेत्र समृद्ध नहीं हो सकता। न तो चकबंदी और न ही काश्तकारी विधान छह करोड़ अस्पृश्यों के लिए सहायक हो सकते हैं, जो भूमिहीन मजदूर हैं। न तो चकबंदी और न ही काश्तकारी विधान उनकी समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं। प्रस्ताव में वर्णित विधि से स्थापित सामूहिक फार्म ही उनके लिए सहायक हो सकते हैं। संबंधित हितों के स्वत्वहरण का कोई प्रश्न नहीं है। परिणामस्वरूप इस आधार पर इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया जाना चाहिए।
योजना की दो विशेषताएं हैं : एक, इसमें प्रस्तावित है कि आर्थिक जीवन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में राजकीय समाजवाद हो। इस योजना की दूसरी खास बात है कि राजकीय समाजवाद की स्थापना विधान - मंडल की इच्छा पर निर्भर नहीं करेगी। राजकीय समाजवाद की स्थापना संवैधानिक विधि द्वारा होगी और इस प्रकार उसे विधायिका और कार्यपालिका के किसी कृत्य से बदला नहीं जा सकेगा।
संवैधानिक विधि के छात्र तुरंत विरोध प्रदर्शित करेंगे। वे निश्चय ही पूछेंगे-क्या यह प्रस्ताव सामान्य प्रकार के मूल अधिकारों की परिधि से बाहर नहीं जाता? मेरा उत्तर है, नहीं। यदि ऐसा दिखाई देता है कि यह उनसे बाहर जाता है तो यह इसलिए है, क्योंकि मूल अधिकारों की संकल्पना जिस पर ऐसी आलोचना आधारित है, एक संकीर्ण संकल्पना है। इससे भी एक कदम आगे कोई यह कह सकता है कि संवैधानिक विधि की परिधि की संकीर्ण संकल्पना से भी, जिसमें मूल अधिकारों से अधिक कुछ न हो, इस प्रस्ताव के लिए पर्याप्त औचित्य हो सकता है, क्योंकि समाज के आर्थिक ढांचे की आकृति और स्वरूप को विधि द्वारा विहित करने का क्या प्रयोजन है? वह प्रयोजन एक व्यक्ति की स्वाधीनता को दूसरे व्यक्तियों के अतिक्रमण से बचाना है और मूल अधिकारों को अधिनियमित करने का यही उद्देश्य है। हो सकता है, व्यष्टि की स्वाधीनता और समाज के आर्थिक ढांचे की आकृति और स्वरूप का संबंध हरेक को दिखाई न दे। फिर भी दोनों के बीच एक वास्तविक संबंध है। यदि निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाए तो वह संबंध प्रकट हो जाएगा।
राजनीतिक लोकतंत्र चार आधार - स्तंभां पर निर्भर करता है, जो निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किए जा सकते हैं :
(i) व्यक्ति अपने आप में एक सिद्धि है।
(ii) व्यक्ति के कुछ अहरणीय अधिकार होते हैं, जिनकी गारंटी उसे संविधान
द्वारा दी जाए।
(iii) कोई विशेषाधिकार प्राप्त करने की पूर्व शर्त के रूप में किसी व्यक्ति से यह