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राज्य और अल्पसंख्यक

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अपेक्षा न की जाए कि वह अपने संवैधानिक अधिकारों में से किसी अधिकार

का परित्याग करे।

(iv) राज्य दूसरों पर शासन करने के लिए गैर - सरकारी लोगों की शक्तियां

प्रत्यायोजित न करे।

जो लोग निजी उद्यम पर आधारित सामाजिक अर्थव्यवस्था और निजी लाभ की कार्यप्रणाली का अध्ययन करते हैं, वे जानते होंगे कि यह लोकतंत्र के अंतिम दो आधार स्तंभों को, यदि वस्तुतः भंग नहीं करती है, तो दुर्बल अवश्य बना देती है। अपनी आजीविका पाने के लिए कितनों को अपने संवैधानिक अधिकार छोड़ने पड़ेंगे? कितने लोगों को प्राइवेट नियोजकों से शासित होना पड़ेगा?

जो बेरोजगार हैं, उनसे पूछिए कि मूल अधिकारों का उनके लिए क्या महत्व है। यदि किसी बेरोजगार से एक ऐसी नौकरी जिसमें कुछ वेतन मिले, कोई निश्चित कार्य घंटे न हों और संघ में शामिल होने की मनाही हो तथा वाक्, संगम, धर्म, आदि की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रयोग के बीच निर्वाचन करने के लिए कजा जाए, तो क्या इसमें कोई संदेह हो सकता है कि उसका निर्वाचन क्या होगा। दूसरा निर्वाचन हो भी कैसे सकता है? भूख का भय, मकान खो देने का भय, बचत, यदि कोई है, से हाथ धो बैठने का भय, बच्चों को स्कूल से निकाले जाने का भय, सार्वजनिक खैरात पर एक बोझ बने रहने का भय, सार्वजनिक खर्च पर दाह का दफन किए जाने का भय-ये सब तत्व इतने प्रबल हैं कि ये किसी आदमी को अपने मूल अधिकारों के लिए खड़ा होने की इजाजत नहीं देते। इस प्रकार बेरोजगार व्यक्ति को काम करने और जीवन - निर्वाह करने का विशेषाधिकार पाने की खातिर अपने मूल अधिकार छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।

जिन्हें रोजगार मिला हुआ है, उनकी क्या स्थिति है? संविधानवेत्ता वकीलों का मानना है कि उनकी स्वाधीनता की रक्षा करने के लिए मूल अधिकारों का अधिनियम पर्याप्त है, इससे अधिक कुछ नहीं चाहिए। उनका तर्क है कि जहां राज्य निजी कार्यकलापों - आर्थिक और सामाजिक - में हस्तक्षेप नहीं करता, वहां स्वाधीनता ही शेष रहती है। आवश्यकता है उस शेष को जितना संभव हो सके व्यापक बनाने की और राज्य के हस्तक्षेप को यथासंभव कम करने की। यह सच है कि जहां राज्य हस्तक्षेप से विमुख रहता है, वहां जो शेष रहता है, वह है स्वाधीनता। किन्तु बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती है। एक और प्रश्न का उत्तर दिया जाना शेष है। यह स्वाधीनता किसे और किसके लिए? प्रकटतः यह स्वाधीनता जमींदारों को लगान बढ़ाने, पूंजीपतियों को कार्य के घंटे बढ़ाने और मजदूरी घटाने की स्वाधीनता है। यही होना अपरिहार्य है, अन्यथा नहीं। क्योंकि ऐसी अर्थव्यवस्था में जिसमें असंख्य कर्मकार नियोजित किए जाएं और नियमित अंतराल पर विशाल पैमाने पर माल का उत्पादन किया जाए, किसी को नियम बनाने होंगे, ताकि कर्मकार काम करें और उद्योग चक्र चलता रहे। यदि राज्य ऐसा नहीं करता है तो प्राइवेट नियोजक करेगा। अन्यथा जीवन असंभव हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, जिसे राज्य के नियंत्रण से मुक्ति कहते