4. राज्य और अल्पसंख्यक - Page 199

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हैं, वही प्राइवेट नियोजक के एकाधिकार का दूसरा नाम है।

ऐसी स्थिति से कैसे बचा जाए? बेरोजगारों एवं रोजगार प्राप्त, दोनों को जीवन, स्वाधीनता, और खुशी हासिल करने के उनके मूल अधिकारों से छले जाने से कैसे बचाया जाए? लोकतांकित्रक देशों द्वारा उपयोगी उपचार है, राजनीतिक क्षेत्र में मनमाने प्रतिबंध लगाने की सरकार की शक्तियों को सीमित रखना तथा आर्थिक क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली व्यक्तियों को कमजोर लोगों पर मनमाने प्रतिबंध अधिरोपित करने से अवरुद्ध करने के लिए विधान-मंडल की साधारण शक्ति का सहारा लेना। यह सुस्थापित है कि अपर्याप्तता योजना को निरर्थक बना देती है। कमजोर लोगों द्वारा विधान - मंडल के प्राधिकार का सहारा ले पाने में सफल होना एक संदिग्ध प्रतिपादन है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि प्रौढ़ मताधिकार के अंतर्गत भी विधान - मंडलों पर एवं सरकारों पर अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली लोगों का नियंत्रण रहता है, मध्यक्षेप करने के लिए विधान - मंडल से अपील करना कमजोर वर्ग की स्वाधीनता हनन के विरुद्ध एक अत्यंत परमुखापेक्षी सुरक्षोपाय है। इस योजना में एक बिल्कुल भिन्न पद्धति का अनुसरण किया गया है। इसमें यह चाहा गया है कि मनमाने अवरोध लगाने की सरकार की शक्ति को ही नहीं, बल्कि अधिक शक्तिशाली व्यक्तियों की शक्ति को भी सीमित रखा जाए अथवा अधिक सुनिश्चित ढंग से यों कह सकते हैं कि अधिक शक्तिशाली द्वारा कम शक्तिशाली लोगों पर मनमाने अवरोध लगाए जाने की संभावना को लोगों के आर्थिक जीवन पर उनके नियंत्रण को हटाकर समाप्त कर दी जाए। इसमें जरा भी संदेह नहीं हो सकता कि कम शक्तिशाली के अधिकारों और स्वाधीनताओं पर अधिक शक्तिशाली के अतिक्रमण के विरुद्ध दो उपचारों में से इस प्रस्ताव में अंतर्विष्ट उपचार निस्संदेह अधिक कारगर है। यदि प्रस्ताव पर इन मताभिव्यक्तियों के प्रकाश में विचार किया जाए, तो यह प्रस्ताव अनिवार्यतः व्यक्ति की स्वाधीनता की रक्षा करने का प्रस्ताव है। अतः कोई संविधानवेत्ता वकील इस आधार पर इसका विरोध नहीं कर सकता कि यह संवैधानिक विधि की सामान्य परिधि से परे है।

अब तक इस योजना पर व्यक्तिगत स्वाधीनता की रक्षा करने के साधन के रूप में चर्चा की गई है। इस योजना का एक दूसरा पहलू भी है, जो उल्लेखनीय है। यह संसदीय लोकतंत्र को निराकृत किए बिना और उसकी स्थापना को संसदीय लोकतंत्र की इच्छा पर छोडे़ बिना राजकीय समाजवाद की स्थापना करने का एक प्रयास है। राजकीय समाजवाद के आलोचक, बल्कि उसके मित्र भी, यही पूछेंगे कि इसे देश के संविधि का अंग क्यों बनाया जाए? इसे विधानयन की साधारण प्रक्रिया द्वारा बनाए जाने का काम विधान - मंडल पर क्यों न छोड़ दिया जाए? इसे साधारण विधान के लिए क्यों नहीं छोड़ा जा सकता, इसका कारण समझना कठिन नहीं है। योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की सफलता की एक अनिवार्य शर्त है कि वह निलंबन या परित्यजन की शिकार नहीं होनी चाहिए। वह स्थायी होनी चाहिए। प्रश्न यह है कि स्थायित्व कैसे आए? स्पष्ट है कि संसदीय लोकतंत्र नामक शासन - प्रणाली के अंतर्गत स्थायित्व नहीं हो सकता। संसदीय लोकतंत्रीय शासन - प्रणाली के अंतर्गत विधायिका एवं कार्यपालिका की नीति तत्समय बहुसंख्यक की नीति होती है।