राज्य और अल्पसंख्यक
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संसदीय लोकतंत्र की शासन - प्रणाली के अंतर्गत एक निर्वाचन में बहुमत उद्योग एवं कृषि में राजकीय समाजवाद के पक्ष में हो सकता है, अगले निर्वाचन में बहुमत उसके खिलापफ हो सकता है। राजकीय समाजवाद विरोधी बहुसंख्यक अपनी विधि - निर्माण शक्ति का प्रयोग राजकीय समाजवाद के बहुसंख्यक समर्थकों के काम को अकृत करने के लिए करेगा और राजकीय समाजवाद का पक्षधर बहुसंख्यक अपनी विधि - निर्माण शक्ति का प्रयोग उन सबको हटाने में करेगा, जो कुछ उसके विपक्षियों ने किया है। जो लोग समाज के आर्थिक ढांचे को राजकीय समाजवाद के आदर्श पर खड़ा करना चाहते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि वे इतने मूलभूत प्रयोजन की सिद्धि को साधारण विधि की आश्रित नहीं बना सकते। साधारण बहुमत को कोई भी काम करने या उसे अकृत करने का अधिकार है-उनका राजनीतिक भाग्य कभी भी तर्कसंगत कारणों से तय नहीं होता। उक्त कारणों से राजनीतिक लोकतंत्र इस प्रयोजन के लिए अनुपयुक्त प्रतीत होता है।
तो फिर इसका विकल्प क्या है? विकल्प है तानाशाही। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तानाशाही वह स्थायित्व प्रदान कर सकती है, जो राजकीय समाजवाद के फलने - फूलने की एक अनिवार्य शर्त के रूप में जरूरी है। किन्तु तानाशाही शासन के खिलाफ एक बात है, जो अवश्य सामने आएगी। जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं, वे तानाशाही का कड़ा विरोध करते हैं और स्वतंत्र समाज के लिए संसदीय लोकतंत्र का उचित शासन - प्रणाली के रूप में आग्रह करते हैं, क्योंकि वे यह महसूस करते हैं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता संसदीय लोकतंत्र के अंतर्गत ही संभव है, न कि तानाशाही के अंतर्गत। परिणामस्वरूप जो स्वतंत्रता चाहते हैं, वे शासन - प्रणाली के रूप में संसदीय लोकतंत्र को छोड़ने को तैयार नहीं हैं। बहरहाल, वे राजकीय समाजवाद अपनाने के लिए चाहे जितन आतुर हों, किन्तु संसदीय लोकतंत्र के बदले में तानाशाही अपनाने के लिए तैयार नहीं होंगे-भले ही ऐसे विनियम की उपलब्धि राजकीय समाजवाद हो। अतः समस्या है तानाशाही रहित राजकीय समाजवाद अपनाने की, संसदीय लोकतंत्र सहित राजकीय समाजवाद पाने की। इसका हल संसदीय लोकतंत्र को रखना तथा संविधि द्वारा राजकीय समाजवाद विहित करना ही प्रतीत होता है, ताकि संसदीय बहुमत उसे निलंबित, संशोधित या निराकृत न कर पाए। इसी मार्ग से तीन उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते हैं। वे हैं, समाजवाद की स्थापना, संसदीय लोकतंत्र जारी रखना और तानाशाही से बचना।
यह प्रस्ताव वर्तमान संविधानों से हटकर है, जिनका उद्देश्य आर्थिक ढांचे की अछूता छोड़कर समाज के राजनीतिक ढांचे की प्रणाली मात्र विहित करना है। परिणामस्वरूप राजनीतिक ढांचा उन ताकतों द्वारा पूरी तरह निराकृत कर दिया गया है, जो आर्थिक ढांचे से उभरता है, जो राजनीतिक ढांचे से भिन्न है। जो लोग संसदीय लोकतंत्र सहित और एकाधिकार रहित समाजवाद चाहते हैं, उन्हें इस प्रस्ताव का स्वागत करना चाहिए।
लोकतंत्र की आत्मा है, एक आदमी, एक मूल्य का सिद्धांत। दुर्भाग्यवश लोकतंत्र ने जहां तक राजनीतिक ढांचे का संबंध है, एक आदमी, एक मत का सिद्धांत अपनाकर इस सिद्धांत को प्रभावी रूप देने का प्रयास किया है। यह माना जाता है कि यह नियम एक आदमी, एक मूल्य के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान करता है। इसने आर्थिक ढांचे