184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
को वह आकृति ग्रहण करने के लिए छोड़ दिया है, जो उसे लोगों ने दी है, उसे जैसे चाहें वैसे ढालने की स्थिति में हैं। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि संविधानवेत्ता वकीलों पर यह पौराणिक संकल्पना हावी रही है कि लोकतंत्र में एक पूर्ण संविधान के लिए जो कुछ जरूरी है वह ऐसी संविधि बनाना है, जो सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाए और जनता पर सरकार के अत्याचारों को रोके। परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक कहे जाने वाले प्रायः सभी देशों के संविधान वयस्क मताधिकार और मूल अधिकारों पर आकर रुक जाते हैं। उन्होंने कभी भी इस दिशा में नहीं सोचा कि लोकतंत्र की संविधि वयस्क मताधिकार और मूल अधिकारों से भी आगे जानी चाहिए। दूसरे शब्दों में, प्राचीनकाल के संविधानवेत्ता वकीलों का मानना था कि संविधि की परिधि और कार्यक्षेत्र समाज के राजनीतिक ढांचे की आकृति और रूप को विहित करना है। उन्होंने यह कभी नहीं समझा कि यदि लोकतंत्र को एक आदमी, एक मूल्य के सिद्धांत की कसौटी पर खरा उतरना है, तो समाज के आर्थिक ढांचे की आकृति और रूप को विहित करना भी उतना ही आवश्यक है। समय आ गया है कि हम साहसी कदम उठाएं और संविधि द्वारा समाज के आर्थिक ढांचे और राजनीतिक ढांचे, दोनों को परिभाषित करें। भारत जैसे उन देशों को जो संविधान - निर्माण के क्षेत्र में बाद में आए हैं, अन्य देशों की कमियों की नकल नहीं करनी चाहिए। उन्हें अपने पूर्ववर्तियों के अनुभव का फायदा उठाना चाहिए।
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अनुभाग 3
खंड 1
1919 और 1935 के भारत सरकार अधिनियमों में प्रांतों और केन्द्र में कार्यपालिका के ढांचे की रचना के लिए जो मॉडल अपनाया गया था, वह ब्रिटिश शैली का था अथवा जिसे संविधानवेत्ता वकील संसदीय कार्यपालिका कहते हैं, जो अमरीकी कार्यपालिका की प्रणाली के विपरीत है, जिसे ब्रिटिश प्रणाली के प्रतिकूल गैर - संसदीय कार्यपालिका कहा जाता है। प्रश्न यह है कि दो अधिनियमों में कार्यपालिका का जो स्वरूप अपनाया गया है, उसे बरकरार रखा जाए या छोड़ दिया जाए और यदि छोड़ना है, तो इसके स्थान पर क्या माडल अपनाया जाए। इस मुद्दे पर अंतिम राय देने से पूर्व यह वांछनीय होगा कि कार्यपालिका के ब्रिटिश मॉडल की विशेषताओं का पता लगाया जाए तथा इस पर विचार किया जाए कि भारत में उसे अपनाने में क्या परिणाम होंगे।
ब्रिटिश अथवा संसदीय कार्यपालिका की निम्नलिखित विशेषताएं कही जा सकती हैंः
(i) इसमें विधान - मंडल में बहुमत प्राप्त करने वाली प्राटी को सरकार बनाने का
अधिकार मिलता है।
(ii) इसमें बहुमत वाली पार्टी को यह अधिकार मिलता है कि वह उन व्यक्तियों
को सरकार से बाहर रखे, जो पार्टी के नहीं हैं।
(iii) इस तरह बनी सरकार तब तक बनी रहती है, जब तक विधान-मंडल में
उसका बहुमत रहता है। बहुमत न रहने पर इसे या तो वर्तमान विधानमंडल