राज्य और अल्पसंख्यक
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से बनी सरकार के पक्ष में या नवनिर्वाचित विधान-मंडल से बनी सरकार
के पक्ष में त्यागपत्र दे देना पड़ता है।
जहां तक भारत में ब्रिटिश प्रणाली लागू होने के परिणामों का संबंध है, स्थिति संक्षेप में इस प्रकार हो सकती है :
(i) बहुमत वाली पार्टी के मंत्रिमंडल की सरकार वाली ब्रिटिश प्रणाली इस विचार
पर आधारित है कि बहुमत राजनीतिक बहुमत है। भारत में बहुमत सांप्रदायिक
बहुमत होता है। सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम जो भी हों, बहुमत
हमेशा सांप्रदायिक बहुमत ही रहेगा। इस स्थिति में परिवर्तन नहीं किया जा
सकता। इस स्थिति के रहते हुए यह स्पष्ट है कि यदि यहां ब्रिटिश प्रणाली
को लागू किया जाएगा, तो इसका परिणाम सांप्रदायिक बहुमत को स्थायी
रूप से कार्यपालिका की शक्ति सौंपना होगा।
(ii) ब्रिटिश प्रणाली बहुमत वाली पार्टी को अल्पसंख्यक पार्टी के प्रतिनिधियों को
मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए बाध्य नहीं करती। यदि यह प्रणाली भारत
में अपनाई गई, तो इसके परिणाम स्पष्ट हैं। इससे बहुमत वाला समुदाय
शासक वर्ग और अल्पमत वाला समुदाय अधीनस्थ समुदाय बन जाएगा। इसका
मतलब होगा कि बहुमत वाला समुदाय अल्पसंख्यकों की भलाई के संबंध में
अपने विचारों के अनुसार प्रशासन चलाने को स्वतंत्र होगा। ऐसी स्थिति को
लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। इसे साम्राज्यवाद कहना पड़ेगा।
इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि भारत में ब्रिटिश प्रणाली की सरकार आमतौर पर अल्पसंख्यकों और विशेषरूप से अस्पृश्यों के जीवन, स्वतंत्रता तथा सुख की तलाश खतरे से भरी होगी।
अस्पृश्यों को जिस समस्या का सामना करना पड़ता है, वह बहुत ही भंकर है। अस्पृश्य उस विशाल हिन्दू आबादी से घिरे हैं, जो उनके प्रति शत्रुतापूर्ण का भाव रखते हैं और उनके खिलाफ अन्याय या अत्याचार करने में लज्जित नहीं होते। नित्यप्रति होने वाले इन अत्याचारों के निराकरण के लिए अस्पृश्यों को प्रशासन की मदद लेनी पड़ती है। अब प्रशासन का स्वरूप और संरचना कैसी है? संक्षेप में, भारत में प्रशासन पूर्णतः हिन्दुओं के हाथ में है। इस पर उनका एकाधिकार है। ऊपर से नीचे तक उस हिन्दुओं का नियंत्रण है। एक भी विभाग ऐसा नहीं है, जिस पर उनका नियंत्रण न हो। पुलिस, दंड विभाग और राजस्व सेवाएं, और प्रस्ताव में प्रशासन की हर शाखा में उन्हीं का वर्चस्व है। दूसरी बात ध्यान में रखने वाली यह है कि प्रशासन में काम करने वाली हिन्दुओं का अस्पृश्यों के प्रति वही असामाजिक और शत्रुतापूर्ण रवैया है, जो प्रशासन से बाहर के हिन्दुओं का है। उनका एकमात्र लक्ष्य होता है अस्पृश्यों से भेदभाव करना और उन्हें न सिर्फ कानून के लाभों से, बल्कि अत्याचार और दमन के विरुद्ध कानून के संरक्षण से भी वंचित करना। इसके परिणामस्वरूप अस्पृश्य हिन्दू आबादी और हिन्दू वर्चस्व वाले प्रशासन के बीच पिसते हैं। एक उनके खिलाफ अत्याचार करता है और दूसरा अत्याचार