राज्य और अल्पसंख्यक
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(iv) अच्छे और कुशल प्रशासन के लिए आवश्यक स्थिर सरकार देना।
यह खंड अमरीकी प्रणाली की सरकार को आदर्श मानकर उसे भारत की स्थितियों के अनुरूप, विशेषकर अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया गया है। प्रस्तावित सरकार के स्वरूप पर इस आधार पर आपत्ति नहीं की जा सकती कि यह उत्तरदायी सरकार के सिद्धांत के खिलाफ है। ब्रिटिश शासन - प्रणाली के अभ्यस्त भारतीय भूल जाते हैं कि यही एकमात्र लोकतांत्रिक और उत्तरदायी सरकार प्रणाली नहीं है। अमरीकी शासन - प्रणाली भी समान रूप से एक लोकतांत्रिक और उत्तरदायी सरकार प्रणाली है। इस प्रस्ताव में आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है कि विधान-मंडल का निर्वाचन जीत लेने मात्र से किसी व्यक्ति को मंत्री बनने के योग्य नहीं मान लिया जाना चाहिए। यह सिद्धांत कि विधान-मंडल का सदय मंत्री बनने से पूर्व जनता से निर्वाचित हो, ब्रिटिश संविधान में एक सौ साल से अधिक समय तक पूर्णतया मान्य रहा। यदि किसी सांसद को मंत्री बनाया जाता था, तो उसे मंत्री पद ग्रहण करने से पहले निर्वाचन लड़ना पड़ता था। बाद में इस सिद्धांत को छोड़ दिया गया। अतः इस प्रस्ताव पर इस आधार पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि यह प्रस्ताव उत्तरदायी सरकार के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। वास्तविक प्रस्ताव अमरीकी स्वरूप की सरकार का संशोधित रूप है, क्योंकि इसके अंतर्गत कार्यपालिका के सदस्य संसद में बैठ सकते हैं, बोल सकते हैं और प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं।
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प्रस्ताव विवादास्पद नहीं हो सकता। अल्पसंख्यकों के प्रति बहुमत के अत्याचार और निरंकुशता का सबसे अच्छा उपचार है पूछताछ, प्रचार और बहस। सुरक्षोपाय में यही व्यवस्था है। इसी तरह की प्रस्ताव सप्रू समिति ने भी रखा था।
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सवर्ण हिन्दू सामाजिक बहिष्कार की तलवार हमेशा अस्पृश्यों के सिर पर लटकाए रखते हैं। केवल अस्पृश्य ही जानते हैं कि सवर्ण हिन्दुओं के हाथ में यह हथियार कितना भयानक है। दलित वर्गों की शिकायतों की जांच के लिए बंबई सरकार ने 1928 में जो समिति नियुक्त की थी, उसकी रिपोर्ट में सामाजिक बहिष्कार के स्वरूप तथा उसके प्रभाव का अच्छा वर्णन किया गया है। इसका अंश नीचे उद्धृत किया जा रहा है। यह स्थिति को इतने सरल ढंग से प्रस्तुत करता है कि हर आदमी समझ सकता है कि सवर्ण हिन्दू अस्पृश्यों पर कैसा अत्याचार करते हैं :
यद्यपि हमने दलित वर्गों के लिए सभी सार्वजनिक सुविधाओं का अधिकार सुरक्षित करने
के लिए विभिन्न उपाय सुझाए हैं, हमें आशंका है कि लंबे समय तक इन अधिकारों
के उपयोग में उन्हें कठिनाई पेश आती रहेगी। पहली कठिनाई उनके खिलाफ सवर्ण
वर्गों की खुली हिंसा के भय की होगी। ध्यान में रखने वाली बात है कि दलित वर्ग
प्रत्येक गांव में बहुत कम संख्या में होता है और उसके मुकाबले सवर्ण भारी संख्या
में होते हैं, जो किसी भी कीमत पर अपने हितों तथा अपनी गरिमा को दलित वर्गों