राज्य और अल्पसंख्यक
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लगभग चार महीने पहले गांव के जाट चौपाल में जमा हुए और उन्होंने हमसे कहा कि हमें उनके खेतों में काम करने की मजदूरी में एक गट्ठर फसल, जिसमें लगभग एक सेर दाने होते हैं, प्रतिदिन प्रति व्यक्ति मिलेगा, बजाए दो वक्त का खाना, फसल का एक भार और आठ आने के जो हमें इससे पहले मिला करता था। चूंकि यह मजदूरी बहुत कम थी जिससे हमारा गुजारा नहीं हो सकता था, हमने काम पर जाने से मना किया। इस पर उन्होंने क्रुद्ध होकर हमारे खिलाफ सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी। उन्होंने नियम बनाया था कि हम बिना टैक्स दिए (जो सरकार के नियमों के अंतर्गत नहीं लग सकता है और जिसे वे ‘पूछी’ कहते हैं) अपने ढोर - डंगर जंगल में नहीं चरा सकते। वे हमारे ढोर - डंगरों के गांव के तालाब में पानी पीने भी नहीं देते और उन्होंने सफाई कर्मचारियों से भी कह दिया है कि जहां हम रहते हैं, उन सड़कों की वे सफाई न करें, जिसके कारण कूड़ा - करकट साफ न होने की सूरत में बीमारी फैलने का डर है। हम शर्म की जिंदगी जीने के लिए बाध्य हैं और वे हमें पीटते हैं तथा हमारी बहू - बेटियों से अभद्र व्यवहार करके हमारी इज्जत - आबरू को तार - तार करते हैं। हमें बहुत भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हमारे स्कूल जाते बच्चों की बुरी तरह और बेरहमी से पीटा भी गया है।
हमने इस तथ्यों का ब्यौरा देते हुए आपको आवेदनपत्र भेजा था, किन्तु हमें खेद है कि आपने अभी तक इस पर कार्रवाई नहीं की। हम आपके विचारार्थ यह निवेदन करते हैं कि पुलिस इंस्पेक्टर और रोहतक के तहसीलदार ने जिनसे हम इस संबंध में मिले थे, लापरवाही से पूछताछ की और हमारे विचार से उन्होंने गरीब और मासूम लोगों की कठिनाइयों को दूर करने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।
अतः हम आपसे निवेदन करते हैं कि आप इस मामले पर विचार करके इस दुर्व्यवहार को तथा जाटों द्वारा विभिन्न प्रकार से दी जाने वाली धमिकयों को बंद कराएं। आपका द्वार खटखटाने के सिवाय हमारे लिए कोई रास्ता नहीं है और हम उम्मीद करते हैं कि आप तत्काल कार्रवाई करके ऐसी व्यवस्था करेंगे जिसमें हम इज्जत और शांति से अपना जीवन बिता सकें, जो मनुष्य जाति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
आपके आज्ञाकारी सेवक
अनुसूचित जाति (चमार)
के लोग गांव : खेरीजेसोर
तहसील और जिला : रोहतक
(अंगूठों के निशान)
प्रतिलिपि : माननीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर, वेस्टर्न कोर्ट, नई दिल्ली।
1 फरवरी, 1947 को प्राप्त।