4. राज्य और अल्पसंख्यक - Page 207

190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

यहा दिखाता है कि जो स्थिति 1928 में थी, वह आज भी है। बंबई के संदर्भ में जो सच है, वह सारे भारत के संदर्भ में सच है। अस्पृश्यों द्वारा बहिष्कार के आम प्रयोग के साक्ष्य के लिए हमें सारे भारत में घटी उन घटनाओं को देखना होगा, जो पिछले प्रांतीय विधान सभाओं के निर्वाचनों में हुई थीं। अस्पृश्य हिन्दुओं की गुलामी से तभी मुक्त हो सकते हैं, जब बहिष्कार को अपराध करार दिया जाएगा।

बहिष्कार के हथियार का उपयोग आजकल अनुसूचित जातियों के अलावा, दूसरे समुदायों के खिलाफ भी किया जाता है। अतः इससे संरक्षण देना सभी छोटे समुदायों के हित में होगा। बहिष्कार से संबंधित प्रावधान बर्मा एंटी बायकाट एक्ट, 1922 से लिए गए हैं।

खंड 4

इस तरह का प्रावधान भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 150 में पहले ही मौजूद है।

अनुच्छेद 2 - अनुभाग 4 अनुच्छेद 2

अनुभाग 4

भाग 1 - खंड 1 भाग 1

खंड 1

इस खंड में कुछ नया नहीं है। विधान - मंडल में प्रतिनिधित्व का अधिकार पूना समझौते में मान लिया गया है। जिन बातां पर पुनर्विचार होना है, वे हैं : (1) प्रतिनिधित्व की मात्रा, (2) अधि - प्रतिनिधित्व, और (3) निर्वाचक - मंडल की प्रणाली।

izfrfufèkRo Col2
zfrfufèkRo zfrfufèkRo
e k=

पूना समझौते में अनुसूचित जातियों को दिए गए प्रतिनिधित्व की मात्रा समझौते के

खंड 1 में दी गई है। इस समझौते का अनुपात (1) अन्य समुदायों का हिस्सा निकालने के बाद, (2) अन्य समुदायों को अधि - प्रतिनिधित्व नियत हो जाने के बाद, और (3) विशेष हितों को सीटों का आबंटन हो जाने के बाद। अनुसूचित जातियों को किए गए सीटों के इस आबंटन में बड़ा अन्याय हुआ है। अधि - प्रतिनिधित्व के रूप में निकाली गई सीटों और विशेष हितों को दी गई सीटों से जो हानि हुई, उसे अनुसूचित जातियों पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इन सीटों का आबंटन कम्युनल अवार्ड द्वारा पूना समझौते से पहले ही किया जा चुका था। अतः उस समय अन्याय का निवारण संभव नहीं था।

zfrfufèkRo Col2

अधि

अनुसूचित जातियां एक और अन्याय का शिकार हैं। इसका संबंध अधि - प्रतिनिधित्व में उनके हिस्से का अधिकार है।

यह स्पष्ट है कि अधि - प्रतिनिधित्व का अधिकार दोहरे विवाद का विषय बन गया है। एक विवाद बहुसंख्यक समुदाय और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच है और दूसरा विवाद विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के बीच है।