राज्य और अल्पसंख्यक
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पहले विवाद का संबंध अधि - प्रतिनिधित्व के सिद्धांत से है। बहुसंख्यक समुदाय इस बात पर जोर देता है कि अल्पसंख्यक समुदाय को कुल जनसंख्या में अपने अनुपात से ज्यादा प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं है। यह कहना मुश्किल है कि बहुसंख्यक समुदाय इस नियम पर जोर क्यों देता है। क्या बहुसंख्यक समुदाय जनसंख्या के अनुपात का अपना दावा इसलिए स्थापित करना चाहता है, ताकि वह हमेशा बहुमत में रहे और बहुमत के रूप में काम करे, या वह इसलिए इस नियम पर जोर देता है कि अल्पसंख्यक समुदाय को जितना भी अधि - प्रतिनिधित्व दिया जाए, वह अल्पमत में ही रहे और इस तथ्य को न बदल सके कि बहुसंख्यक समुदाय हमेशा अपनी इच्छा अल्पसंख्यक समुदायों पर लाद सकता है। पहला आधार बहुमत शासन की मूल संकल्पना का पूर्ण नकार है, क्योंकि इस संकल्पना का सही अर्थ इतना ही है कि बहुमत का फैसला ऐसा हो, जिसके लिए अल्पमत ने अपने को मानसिक रूप से राजी कर लिया हो। बहुसंख्यक समाज का यह आशय नहीं हो सकता। इसकी कुछ और उदार व्याख्या की जानी चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि बहुसंख्यक समुदाय का अभिप्राय पहले तर्क पर नहीं, दूसरे तर्क पर आधारित है। इस बात को देखते हुए कि बहुसंख्यक समुदाय बहुमत में बने रहने और राजनीतिक बहुमत के विशेषाधिकार पाने के लिए जोर दे रहा है, जबकि वह राजनीतिक बहुमत नहीं है, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि अल्पसंख्यक समुदाय अधि - प्रतिनिधित्व के बावजूद अल्पमत में ही रहेगा। लेकिन पूरी धुलाई वाली हार और उस हार में जो जीत तो नहीं किन्तु जीत जैसी होती है, बड़ा फर्क होता है। क्रिकेट के खिलाड़ी जानते हैं कि कुछ रनों या कुछ विकटों की हार और पारी की हार के बीच क्या अंतर है। पूरी पारी की हार पूरी तरह हताश करने वाली होती है, जब कि कुछ रनों की हार ऐसी नहीं होती। इस प्रकार की हार जब अल्पसंख्यक समुदाय के राजनीतिक जीवन में आती है तो उससे वह समुदाय पूरी तरह हतोत्साहित हो जाता है, उसका मन पूरी तरह टूट जाता है। किसी भी कीमत पर ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। इस दृष्टि से देखने पर इसमें संदेह नहीं कि जनसंख्या अनुपात के प्रतिनिधित्व का नियम, जिस पर बहुसंख्यक समुदाय अब जोर दे रहा है, गलत है। अल्पसंख्यक समुदाय की जरूरत अधिक प्रतिनिधित्व नहीं, प्रभावकारी प्रतिनिधित्व है।
प्रभावकारी प्रतिनिधित्व क्या है? प्रतिनिधित्व की प्रभावकारिता इस पर निर्भर करती है कि प्रतिनिधित्व इतना हो कि अल्पसंख्यक समुदाय को ऐसा न लगे कि बहुमत उस पर पूरी तरह छा गया है। जनसंख्या के अनुपात में किसी अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व या सभी अल्पसंख्यक समुदायों का कुछ प्रतिनिधित्व उस सूरत में तो प्रभावकारी हो सकता है, जब अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी (अगर एक ही ऐसा समुदाय हो तो) इतनी हो कि उनका प्रतिनिधित्व काफी बड़ा हो जाए। लेकिन ऐसी स्थितियां भी हो सकती हैं, जब अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी या सब अल्पसंख्यक समुदायों की कुल आबादी इतनी थोड़ी हो कि आबादी के अनुपात के कड़े मानदंडों से प्रतिनिधित्व तय होने पर उन्हें प्रभावकारी प्रतिनिधित्व न मिले। इस तरह के कड़े मानदंडों पर जोर