192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
देना अल्पसंख्यकों के संरक्षण के उस सिद्धांत का मजाक उड़ाना होगा, जो प्रतिनिधित्व के अधिकार का लक्ष्य है और जिसे अल्पसंख्यकों के जायज अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। ऐसी स्थिति में अधि - प्रतिनिधित्व आवश्यक होता है जिसका मतलब है, बहुसंख्यक समुदाय को जनसंख्या अनुपात से मिलने प्रतिनिधित्व की मात्रा से सीटें कम करना। यदि बहुसंख्यक समुदाय न्यायप्रिय तथा ईमानदार बनना चाहता है तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए। अतः अधि - प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर कोई विवाद नहीं हो सकता। इस आधार पर विवाद इस सवाल तक सीमित रह जाता है कि अधि - प्रतिनिधित्व की मात्रा किस प्रकार निश्चित हो? यह प्रयोजन का सवाल है, सिद्धांत का नहीं।
अतः अधि - प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं की जा सकती। अधि - प्रतिनिधित्व की मांग अल्पसंख्यक समुदायों की सामान्य मांग है और वहां सभी अनुसूचित जातियों को इसमें एक हो जाना चाहिए, जहां बहुसंख्यक समुदाय बहुत बड़ा हो। वर्तमान अधि - प्रतिनिधित्व का दोष यह है कि अनेक अल्पसंख्यक समुदायों को असमान प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। इस समय कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को अधि - प्रतिनिधित्व का बड़ा अंश मिला हुआ है, जब कि अस्पृश्यों को अधि - प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं मिला है। तर्कसंगत सिद्धांतों पर अधि - प्रतिनिधित्व का वितरण करके इस गलती को ठीक किया जाना चाहिए।
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- अनुसूचित जातियों को आबंटित सीटों के निर्वाचन की विधि पूना समझौते के
खंड 2 से खंड 4 में दी गई है। इसमें दोहरे निर्वाचन की व्यवस्था है : (1) प्राथमिक निर्वाचन, और (2) अंतिम निर्वाचन। प्राथमिक निर्वाचन अनुसूसचित जातियों के पृथक निर्वाचक - मंडल द्वारा होगा। यह अर्हताकारी निर्वाचन है और यह निश्चित करता है कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों के लिए अंतिम निर्वाचन कौन लड़ सकता है। अंतिम निर्वाचन संयुक्त निर्वाचक - मंडल से होगा, जिसमें सवर्ण हिन्दू और अनुसूचित जातियां, दोनों का वोट होगा और उससे अंतिम निर्णय तय होगा।
पूना समझौते के खंड 5 से प्राथमिक निर्वाचन - प्रणाली दस वर्ष तक सीमित है, जिसका मतलब है कि 1947 के बाद होने वाले निर्वाचन स्पष्टता से संयुक्त निर्वाचक - मंडल और आरक्षित सीटों के आधार पर होंगे।
यदि हिन्दू दोहरी निर्वाचन - प्रणाली को अधिक अवधि के लिए बढ़ा दें, तो भी अनुसूचित जातियों को संतोष नहीं होगा। प्राथमिक निर्वाचन के बने रहने पर दो आपत्तियां हैं। प्रथम, इससे सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को चुनने में अनुसूचित जातियों को मदद नही मिलती। जैसा कि परिशिष्ट 3 में देखा जा सकता है, जो उम्मीदवार प्राथमिक निर्वाचन में सर्वप्रथम आता है, वह अंतिम निर्वाचन में नहीं जीत पाता और जो अनुसूचित जाति का उम्मीदवार प्राथमिक निर्वाचन में असफल होता है, वह अंतिम निर्वाचन में प्रथम आता है। दूसरे, प्राथमिक निर्वाचन अधिकतर काल्पनिक होता है, यथार्थ नहीं होता। पिछले निर्वाचन में