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राज्य और अल्पसंख्यक

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अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 151 सीटों में से केवल 43 के लिए प्राथमिक निर्वाचन हुए। यह इसलिए कि अनुसूचित जातियों के लिए प्राथमिक और अंतिम, दो निर्वाचनों का

खर्च उठाना असंभव होता है। ऐसी प्रणाली को बनाए रखने का कोई लाभ नहीं है।

  1. संयुक्त निर्वाचक - मंडल और आरक्षित सीटों की प्रणाली से, जो पूना समझौते के अंतर्गत अब लागू होगी, स्थिति और भी खराब होगी। यह महज अटकल नहीं है। पिछले निर्वाचन में यह पूर्णतः सिद्ध हो गया है कि संयुक्त निर्वाचक - मंडल के अंतर्गत अनुसूचित जातियों को पूरी तरह मताधिकार से वंचित किया जा सकता है। जैसा कि परिशिष्ट 3 में दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि अनुसूचित जातियों के उम्मीदवार न केवल हिन्दू वोट से चुने गए, जबकि उद्देश्य यह था कि वे अनुसूचित जातियों द्वारा चुने जाएं, बल्कि इससे भी बड़ी बात यह है कि हिन्दुओं ने अनुसूचित जातियों के उन उम्मीदवारों को चुना जो प्राथमिक निर्वाचन में असफल हुए थे। यह अनुसूचित जातियों को पूर्णतः मताधिकार से वंचित करना है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिकांश निर्वाचन - क्षेत्रों में सवर्ण हिन्दुओं की मतदाता संख्या और अनुसूचित जातियों की मतदाता संख्या में बहुत बड़ा अंतर है। यह परिशिष्ट 3 में दिए गए आंकड़ों से स्पष्ट है। जैसा कि साइमन कमीशन ने कहा है कि यदि किसी साधारण निर्वाचन - क्षेत्र में संरक्षित समुदाय बहुत अल्पमत में होगा तो आरक्षित सीटों की प्रणाली ठीक से काम नहीं करेगी। अनुसूचित जातियों के मामले में ठीक यही हो रहा है। इस असंगति की उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह वयस्क मताधिकार प्रणाली के अंतर्गत भी रहेगी। ऐसी स्थिति में एक सर्वथा निर्देष प्रणाली की

खोज की जानी चाहिए, जो अनुसूचित जातियों को वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करे। इस तरह की प्रणाली में निम्नलिखित को समाप्त करना पड़ेगा :

(i) प्राथमिक निर्वाचन जो अनावश्यक और भारी बाधा है, और (ii) पृथक निर्वाचक -

मंडल की प्रतिस्थापना।

  1. राजनीति में हिन्दुओं और अनुसूचित जातियों के संबंधों को कटु बनाने वाला एक मुद्दा निर्वाचक - मंडल का है। अनुसूचित जातियां पृथक निर्वाचक - मंडल के लिए जोर देती रही हैं। सवर्ण हिन्दू इस मांग का उतने ही जोर से विरोध करते हैं। इस मुद्दे पर किसी समाधान पर पहुंचने के लिए (जिसके बिना सवर्ण हिन्दुओं और अनुसूचित जातियों में कभी शांति और सौहार्द स्थापित नहीं होगा) यह निश्चित करना जरूरी है कि कौन सही है और कौन गलत तथा इस मांग का विरोध किसी तर्क पर आधारित है या महज पूर्वाग्रह पर आधारित है।

  2. अनुसूचित जातियों की पृथक निर्वाचक - मंडल की मांग के खिलाफ आम तौर पर ये तर्क दिए जाते हैं :

(i) अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक वर्ग नहीं हैं,

(ii) अनुसूचित जातियां हिन्दू हैं, अतः उन्हें पृथक निर्वाचक - मंडल नहीं मिल

सकता,