194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
(iii) पृथक निर्वाचक - मंडल होने से अस्पृश्यता हमेशाबनी रहेगी,
(iv) पृथक निर्वाचक - मंडल राष्ट्र विरोधी है, और
(v) पृथक निर्वाचक - मंडल ब्रिटिश साम्राज्यवाद को इस योग्य बनाता है कि वह
पृथक निर्वाचक - मंडल वाले समुदायों को प्रभावित कर उन्हें देश के हित के
विरुद्ध काम करने को प्रेरित करे।
- क्या ये तर्क उचित हैं?
(i) यह कहना कि अनुसूचित जातियां अल्पसंख्यक वर्ग नहीं हैं, अल्पसंख्यक
वर्ग शब्द का गलत अर्थ लगाना है। धर्म की पृथकता अल्पसंख्यक वर्ग
होने की एकमात्र कसौटी नहीं है। न ही यह अच्छी और सक्षम कसौटी है।
कोई सामाजिक समूह अल्पसंख्यक वर्ग है या नहीं, इसकी सही कसौटी
सामाजिक भेदभाव है। श्री गांधी ने भी धार्मिक पृथकता की तुलना में
इसे अधिक तर्कसंगत और व्यावहारिक कसौटी माना है। इस कसौटी को
अपनाते हुए उन्होंने 21 अक्तूबर, 1939 के हरिजन के संपादकीय में दि
फिक्शन ऑफ मैजारिटी शीर्षक के अंतर्गत यह विचार रखा है कि भारत
में अनुसूचित जातियां ही वास्तविक अल्पसंख्यक वर्ग हैं।
(ii) यह कहना कि अनुसूचित जातियां हिन्दू हैं और इसलिए वे पृथक निर्वाचक -
मंडल की मांग नहीं कर सकती, एक ही तर्क को अलग ढंग से प्रस्तुंत
करना है। धर्म को संवैधानिक सुरक्षा के लिए निर्णायक मानना इस तथ्य की
उपेक्षा करना है कि धार्मिक जुड़ाव के साथ - साथ तीव्र सामाजिक पार्थक्य
और भेदभाव भी रहता है। यह मान्यता कि पृथक निर्वाचक - मंडल पृथक
धर्म के साथ जुड़ा हुआ है, इस कारण बनी है कि जिन समुदायों को पृथक
निर्वाचक - मंडल मिला हुआ है, वे धार्मिक समुदाय है। लेकिन यह सही
नहीं है। मुसलमानों को इसलिए पृथक निर्वाचक - मंडल नहीं मिला है कि
वे धर्म के मामले में हिन्दुओं से भिन्न हैं। उन्हें इसलिए पृथक निर्वाचक -
मंडल मिला है कि (और यह मूल कारण है) मुसलमानों और हिन्दुओं के
सामाजिक संबंधों में सामाजिक भेदभाव है। इसी बात को किंचित अलग
ढंग से इस प्रकार भी रखा जा सकता है। निर्वाचक - मंडल का स्वरूप
धर्म के संदर्भ में नहीं, सामाजिक भेदभाव के संदर्भ में निश्चित होता है।
निर्वाचक - मंडल के स्वरूप के निर्धारण का आधार धार्मिक संबंध या पार्थक्य
न होकर सामाजिक है। इसका सबसे अच्छा प्रमाण वह व्यवस्था है, जो
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत भारत के ईसइार् समुदाय के लिए
की गई है। ईसाई समुदाय को तीन श्रेणियों में बांटा गया है-यूरोपियन,
आंग्ल भारतीय और भारतीय ईसाई। इस बात के बावजूद कि तीनों धर्म
से ईसाई हैं, प्रत्येक श्रेणी को पृथक निर्वाचक - मंडल दिया गया है। इससे