राज्य और अल्पसंख्यक
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जाहिर होता है कि निर्णायक तत्व धार्मिक संबंध नहीं, सामाजिक पार्थक्य
है।
(iii) यह कहना कि पृथक निर्वाचक - मंडल अस्पृश्यों और सवर्ण हिन्दुओं की
एकता में बाधक है, भ्रमपूर्ण सोच का परिणाम है। निर्वाचन पांच साल में
एक बार होते हैं। मान लें कि निर्वाचन संयुक्त निर्वाचक - मंडल के अंतर्गत
होते हैं। उस स्थिति में यह समझ पाना मुश्किल है कि सवर्ण हिन्दू तथा
अस्पृश्यों में एक दिन एक साथ वोट देने से सामाजिक एकता कैसे हो
जाएंगे, जब कि शेष पांच साल वे अलग - अलग जिंदगी जिएंगे। इसी तरह
मान लीजिए कि निर्वाचन पृथक निर्वाचक - मंडल के अंतर्गत होते तो इस
स्थिति में भी यह समझ पाना मुश्किल है कि पांच साल में एक दिन पृथक
मतदान करने से दोनों के बीच उससे ज्यादा अलगाव कैसे हो जाएगा,
जितना अलगाव पहले से विद्यमान है। इसे दूसरी तरह से देखें तो पांच
साल में एक दिन अलग - अलग मतदान करने से एकता चाहने वालों के
काम में किस तरह रुकावट आएगी? उदाहरण के लिए अस्पृश्यों को पृथक
निर्वाचक - मंडल मिलने से उनके और सवर्ण हिन्दुओं के बीच परस्पर विवाह
और सहभोज में कैसे बाधा पड़ेगी? अतः यह कहना बिल्कुल निरर्थक है
कि पृथक निर्वाचक - मंडल से सवर्ण हिन्दुओं तथा अस्पृश्यों के बीच हमेशा
अलगाव बना रहेगा।
(iv) यह कहना कि पृथक निर्वाचक - मंडल से राष्ट्र-विरोधी भावना पैदा होगी,
अनुभव के विपरीत है। सिखों को पृथक निर्वाचक - मंडल मिला हुआ है,
किन्तु कोई यह नहीं कह सकता कि सिख राष्ट्र - विरोधी हैं। मुसलमानों
को 1909 से ही पृथक निर्वाचक - मंडल मिला हुआ है। श्री जिन्ना पृथक
निर्वाचक - मंडल के अंतर्गत चुने गए हैं। तथापि, जिन्ना 1935 तक भारतीय
राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक रहे हैं। भारतीय ईसाइयों को पृथक निर्वाचक -
मंडल मिला हुआ है। तथापि, ईसाइयों ने बड़ी संख्या में कांग्रेस के प्रति
अपना प्रेम दिखाया है, हालांकि वे कांग्रेस के टिकट पर निर्वाचन नहीं
जाते। जाहिर है, राष्ट्रवाद या राष्ट्र - विरोधी भावना का निर्वाचक - मंडल की
प्रणाली से कोई संबंध नहीं है। ये निर्वाचनेतर शक्तियों का परिणाम हैं। (v) इस तर्क में कोई दम नहीं है। यह महज पलायनवाद है। जो भी हो, स्वतंत्र
भारत में निर्वाचक - मंडल के संबंध में उस आधार पर की गई आपत्ति का
कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
- पृथक निर्वाचक - मंडल के विरोधियों की युक्तियां तर्क और अनुभव की कसौटी पर इसलिए खरी नहीं उतरतीं कि ये युक्तियां मूलतः गलत हैं। ये दो दृष्टियों से गलत हैं :
(i) वे यह नहीं समझ पाते हैं कि निर्वाचक - मंडल की प्रणाली का धार्मिक या सांप्रदायिक संबंध से कुछ लेना - देना नहीं है। यह ऐसी व्यवस्था है, जिसका