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राज्य और अल्पसंख्यक

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हुआ, तो इसका कारण था कि इस तरह के प्रावधान की तब कोई जरूरत नहीं थी। ऐसा दो कारणों से था। पहला तो यह कि पूना समझौते के समय किसी भी समुदाय को कानून द्वारा कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व की निश्चित मात्रा का आश्वासन नहीं दिया गया था। दूसरे, कार्यपालिका में विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व परंपरा पर छोड़ा गया था, जिसका पालन जारी निर्देशों के अनुसार गवर्नर को कराना था। अनुभव बताता है कि अब कार्यपालिका में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व की मात्रा निर्धारित होनी चाहिए।

भाग 1 - खंड 3

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भाग 1

यह मांग नई नहीं है। पूना समझौते के खंड 8 में अनुसूचित जातियों को सरकारी सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व का आश्वासन दिया गया है। किन्तु इसमें प्रतिनिधित्व की मात्रा निर्धारित नहीं की गई है। मांग को भारत सरकार ने उचित कहकर मान लिया है और प्रतिनिधित्व की मात्रा भी निर्धारित की गई है। अब सिर्फ इसे वैधानिक आधार देना शेष है।

भाग 2 - खंड 1 भाग 2

खंड 1

यह भी नई मांग है। पूना समझौते के खंड 9 में आश्वासन दिया गया है कि अनुसूचित जातियों की शिक्षा के लिए पर्याप्त धन राशि आबंटित की जाएगी। किन्तु मात्रा निर्धारित नहीं की गई है। मांग का उद्देश्य इतना ही है कि इस संबंध में राज्य की देयता की मात्रा निर्धारित की जाए। इस संबंध में भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 83 को देखा जाए, जिसका संबंध आंग्ल भारतीय और यूरोपियनों की शिक्षा से तथा भारत सरकार द्वारा अलीगढ़ विश्वविद्यालय तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को दिए जाने वाले अनुदान से है।

भाग 2 - खंड 2 भाग 2

खंड 2

यह नई मांग है, किन्तु इसका औचित्य परिस्थितियों से सिद्ध है। इस समय सवर्ण हिन्दू गांवों में रहते हैं और अस्पृश्य गंदी बस्तियों में। उद्देश्य यह है कि अस्पृश्यों को हिन्दुओं की दासता से मुक्त किया जाए। जब तक वर्तमान व्यवस्था चलती रहेगी, तब तक अस्पृश्य न तो हिन्दुओं की गुलामी सो मुक्त हो पाएंगे और न उनका अस्पृश्यता से पीछा छूटेगा। एक ही गांव में रहने वाले हिन्दुओं और अस्पृश्यों के बीच अत्यंत निकट संबंध के कारण ही अस्पृश्य अलग से पहचाने जाते हैं और सवर्ण हिन्दू उन्हें अस्पृश्य मानते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत गांवों का देश है और जब तक ग्राम - प्रणाली में अस्पृश्यों को आसानी से पहचाना जा सकता है, अस्पृश्यों को अस्पृश्यता से छुटकारा नहीं मिल सकता। गांवों के साथ लगी गंदी बस्तियों की प्रणाली ही अस्पृश्यता को स्थायी बनाती है। अतः अस्पृश्यों की मांग है कि इस संबंध को तोड़ा जाए और अस्पृश्यों को जो वस्तुतः सामाजिक रूप से पृथक हैं, क्षेत्रीय एवं भौगोलिक रूप से पृथक किया जाए और उन्हें अलग गांवों में बसाया जाए, जो केवल अस्पृश्यों के गांव हों, जिनमें ऊंच - नीच का और स्पृश्य तथा अस्पृश्य का कोई भेद न हो।

पृथक बस्तियों की मांग का दूसरा कारण गांवों में अस्पृश्यों की आर्थिक स्थिति है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनकी स्थिति बहुत दयनीय है। यह