4. राज्य और अल्पसंख्यक - Page 215

198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भूमिहीन मजदूर समुदाय है जो पूर्णतया उस रोजगार पर निर्भर होता है, जो सवर्ण हिन्दू उन्हें देते हैं और उन्हें उसी मजदूरी पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसे देना हिन्दू अपने लिए लाभदायक मानते हैं। जिस गांव में वे रहते हैं, वहां वे कोई और काम नहीं कर सकते, क्योंकि अस्पृश्य होने के कारण हिन्दू उनसे लेन - देन नहीं करेगा। अतः यह स्पष्ट है कि जब तक अस्पृश्य हिन्दू गांव के अधीन उसके भाग के रूप में गंदी बस्तियों में रहते हैं, तब तक वे अपने लिए उपलब्ध रोजगारों से जीविका नहीं कमा सकते।

इस आर्थिक निर्भरता के निर्धनता और अपमान के अलावा और भी दुष्परिणाम होते हैं। हिन्दुओं की एक जीवन - संहिता है, जो उनके धर्म का हिस्सा है। यह संहिता उन्हें कई विशेषाधिकार देती है और अस्पृश्यों पर कई ऐसे अपमान लादती है, जो मानव - जीवन की पवित्रेता तथा गरिमा के विरुद्ध हैं। अस्पृश्य सारे भारत में उन अन्यायों और अपमानों से लड़ रहे हैं, जिन्हें धर्म के नाम पर हिन्दू उन पर लादते रहे हैं। हिन्दुओं और अस्पृश्यों के बीच गांव में हर रोज एक शाश्वत युद्ध चल रहा है। यह युद्ध दिखाई नहीं देता। हिन्दू समाचार - पत्र इसका प्रसार करने के लिए तैयार नहीं होते, इस डर से कि कहीं दुनिया की नजरों में उनकी आजादी का ध्येय बदनाम न हो जाए। तथापि अस्पृश्यों और स्पृश्यों के बीच जल रहा संघर्ष वास्तविकता है। गांव - प्रणाली में अस्पृश्य सम्मानजनक और स्वतंत्र जीवन के अपने संघर्ष में बहुत बाधा महसूस करता है। यह संघर्ष आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत हिन्दुआें और निर्धन तथा संख्या में कम अस्पृश्यों के बीच है। हिन्दू अस्पृश्यों को दबाने में अक्सर सफल हो जाते हैं। इसके कई कारण हैं। हिन्दुओं की तरफ पुलिस और दंड विभाग होता है। अस्पृश्यों और हिन्दुओं के झगड़े में अस्पृश्यों को कभी पुलिस से संरक्षण और मजिस्ट्रेट से न्याय नहीं मिलता है। पुलिस और मजिस्ट्रेट अपने कर्त्तव्य से ज्यादा अपने वर्ग से प्यार करते हैं, किन्तु हिन्दुओं के शस्त्रागार का मुख्य हथियार उनकी आर्थिक शक्ति हैं, जो गांव में रहने वाले निर्धन अस्पृश्यों पर उन्हें प्राप्त होती है। प्रस्ताव को पलायनवाद कहा जा सकता है, किन्तु इसका एकमात्र विकल्प है, शाश्वत गुलामी।

भाग 3 - खंड 1

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भाग 3

हर देश में जिसमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक संप्रदायों की समस्या होती है, दोनों के बीच राजनीतिक सत्ता की साझेदारी की कोई न कोई व्यवस्था होती है। दक्षिण अफ्रीका में ऐसी व्यवस्था है और कनाडा में भी। कनाडा में फ्रेंच भाषी और अंग्रेजी भाषी आबादी के बीच राजनैतिक सत्ता की साझेदारी छोटे से छोटे दफ्तर के स्तर तक है। इस तथ्य का उल्लेख करते हुए श्री पोरिट ने अपनी पुस्तक एवोल्यूशन ऑफ डोमीनियन आफ कनाडा में कहा है :

ओटावा की स्थितियां जो अंशतः नस्ल और भाषा के कारण हैं और अंशतः सभी

शासकीय लाभों के वितरण की दीर्घकालिक परंपरा के कारण, उस ब्रिटिश परंपरा

के खिलाफ हैं, जिसके अनुसार सदस्य दो या तीन विधान-मंडलों के कार्यकाल