200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
सिद्धांत विकसित किया है, जिसे बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों पर मनमर्जी का शासन करने का दैवी अधिकार कहा जा सकता है। अल्पसंख्यक समुदायों के सत्ता की साझेदारी के किसी भी दावे को संप्रदायवाद कह दिया जाता है, जब कि बहुसंख्यक समुदाय द्वारा सारी सत्ता पर एकाधिकार को राष्ट्रवाद कहा जाता है। इस तरह की विचारधारा से निर्देशित बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यक समुदाय को सत्ता में साझेदारी देने को तैयार नहीं होता और न ही वह इस बारे में किसी परंपरा को मनाने के लिए तैयार होता है, जैसा कि उसके द्वारा उन दायित्वों के विरोध से प्रकट हैं, जो भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत गवर्नरों को जारी निर्देशों में सम्मिलित है (जिनमें अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि मंत्रिमंडल में शामिल करने को भी कहा गया है)। इन स्थितियों में अनुसूचित जातियों के अधिकारों को संविधान में समाविष्ट करने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है।
भाग 3 - खंड 2 भाग 3
खंड 2
यह नई मांग नहीं है। यह पूना समझौते के खंड 6 की जगह लेती है, जिसमें कहा गया है कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण द्वारा प्रतिनिधित्व की प्रणाली तब तक चलती रहेगी, जब तक समझौते के संबंधित पक्ष आपसी सहमति से तय न कर लें। चूंकि अनुसूचित जातियों के लिए किए गए सुरक्षोपायों में परिवर्तन - संशोधन करने के संबंध में अनुसूचित जातियों की इच्छा का पता लगाने की कोई अच्छी विधि इस समय नहीं है, समझौते के खंड 6 की जगह लेने के लिए एक योजना बनाना आवश्यक है। प्रस्ताव में रखे गए प्रावधानों से मिलते - जुलते प्रावधान आस्ट्रेलिया, अमरीका और दक्षिण अफ्रीका के संविधानों में हैं।
इस प्रकार के मामले पर विचार करते समय दो बातों को ध्यान में रखना होगा। पहली यह कि हमें इस संभावना को मानकर चलना चाहिए कि भविष्य में समझौते से संबंधित पक्ष सुरक्षोपायों में परिवर्तन कर सकते हैं। दूसरी ओर इनके परिवर्तन के लिए लगातार संघर्ष होता रहे, यह भी वांछनीय नहीं है। यदि नया संघ और राज्य विधान-मंडलों को उद्देश्यिका में दिए गए दायित्वों को सफलतापूर्वक निभाना है, तो यह वांछनीय होगा कि वे सुरक्षोपायों के परिवर्तन के संबंध में उठने वाले सवालों को लेकर विभिन्न धर्मों और वर्गों के बीच के तीव्र मतभेदों से प्रभावित न हों। अतः 25 साल बाद किसी भी परिवर्तन पर विचार करने का सुझाव दिया गया है। भाग 4
इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ब्रिटिश भारत में अनुसूचित जातियों के लिए जो सुरक्षोपाय किए गए हैं, वे देशी राज्यों में भी अनुसूचित जातियों को मिलें। प्रावधान में कहा गया है कि संघ में शामिल होने वाली देशी राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके संविधान में सुरक्षोपाय हैं।