राज्य और अल्पसंख्यक
203
परिशिष्ट 3
पूना समझौते के दोष
पूना समझौते का उद्देश्य ऐसी विधि बनाना था, जिससे अनुसूचित जातियां अपनी पसंद के प्रतिनिधि विधान - मंडलों में भेज सकें। यह उद्देश्य पूरी तरह विफल हो गया है, जैसा कि आगे दी गई अंक - सारणियों से ज्ञात होगा। ये सारणियां फरवरी 1946 में हुए निर्वाचनों के परिणामों से तैयार की गई हैं।
आंकड़े चार सारणी मालाओं में दिए गए हैं :
पहली माला में सफल सवर्ण हिन्दू उम्मीदवारों को मिले वोट और सफल अनुसूचित
जाति उम्मीदवार को अंतिम निर्वाचन में मिले वोट के आंकड़ें हैं।
दूसरी माला में दिखाया गया है कि कितने मामलों में अनुसूचित जाति के उम्मीदवार
को अंतिम निर्वाचन में सफलता के लिए आरक्षण संबंधी खंड का सहारा लेना जरूरी
हुआ और कितने मामलों में वह आरक्षण के लाभ के बिना जीता।
तीसरी माला में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों वाले निर्वाचन - क्षेत्रों में
सवर्ण हिन्दुओं और अनुसूचित जातियों की तुलनात्मक वोट संख्या दिखाई गई है।
चौथी मामला में अंतिम निर्वाचन में जीते अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों की
प्राथमिक निर्वाचन में क्या स्थिति थी, वह दिखाया गया है।
- इन आंकड़ों के निष्कर्ष उनके ध्यान में अवश्य आएंगे, जो इनका अध्ययन करेंगे। आंकड़ों से निम्नलिखित बातें सिद्ध होती हैं :
(i) अंतिम निर्वाचन में जीतने वाला अनुसूचित जातियों का उम्मीदवार अनुसूचित
जातियों के वोटों पर नहीं, सवर्ण हिन्दुओं के वोटों से जीता। उनमें से अनेक
उम्मीदवार प्राप्त मतों में सबसे ऊपर रहे और उन्हें सवर्ण हिन्दू उम्मीदवारों
को मिले वोट के बराबर या उनसे भी अधिक वोट मिले (देखें, प्रथम माला
की सारणियां)। दूसरे, बहुत कम निर्वाचन - क्षेत्रों में सफल अनुसूचित जाति के
उम्मीदवार को आरक्षण पर निर्भर रहना पड़ा (देखें, दूसरी माला की सारणियां)।
यह अत्यंत अप्रत्याशित तथ्य है। जो भी विभिन्न क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों
और सवर्ण हिन्दुओं की मतदाता संख्या की तुलना करेगा (देखें, तीसरी माला
की सारणियां), वह यह मानेगा कि अनुसूचित जातियांं की मतदाता संख्या
इतनी कम है कि यदि अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को अनुसूचित
जातियों का ही वोट मिलता, तो उक्त तथ्य देखने को नहीं मिलता। तथ्य
इस बात का सकारात्मक प्रमाण है कि अंतिम निर्वाचन में अनुसूचित जातियां
के उम्मीदवार की सफलता सवर्ण हिन्दू वोटों के कारण है।