6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अलग - अलग हैं। लेकिन संभवतः हमारे अति विशाल भारत की सर्वाधिक सुस्पष्ट
विशेषता यह है कि वह दो शक्तिशाली राजनीतिक समुदायों में बंटा हुआ है और उनमें
आकाश - पाताल का अंतर है। एक ओर हिन्दू हैं, जिनमें व्यापक जातिभेद हैं। दूसरी
ओर मुसलमान हैं, जिनमें सामाजिक समता है। छोटी - छोटी जातियां भी हैं। उनमें
से अधिकांश की संख्या लाखों में है। उनमें भी आपस में नृजातीय अथवा राजनीतिक
आधार पर वैसा ही भारी अलगाव है, जैसा कि हिन्दुओं का मुसलमानों से है। उदाहरण
के लिए सिखों की वृत्तियां और पंरपराएं जुझारू होती हैं और उनमें धार्मिक जोश होता
है। रोहिल्ले, पठान, असमी, बलूच, वनवासी योद्धा जातियां हैं, जो हमारी सीमाओं पर
रहती हैं। हिमालय की गोद में पहाड़ी लोग रहते हैं। बर्मा के हमारे प्रजाजन मंगोल
जाति के हैं और बौद्ध धर्म को मानते हैं। मध्य तथा दक्षिण भारत में गोंड, महार, भील
तथा अन्य अनार्य लोग हैं। पारसी लोग भी हैं, जो उद्यमी होते हैं। उनके उत्पादन
और वाणिज्यिक हितों में तेजी से विकास हो रहा है। लेकिन इन बहुसंख्य जातियों
के मध्य हमें एक साथ सभ्यता की उन सभी विभिन्न अवस्थाओं के दर्शन हो सकते
हैं, जिनमें होकर मानव जाति प्रागैतिहासिक युग से लेकर आज तक गुजरी है।
अंग्रेज सदा ही इस बात पर जोर देते रहे हैं कि भारत, प्रतिनिधि सरकार के योग्य नहीं है, क्योंकि इसके लोग जातियों तथा संप्रदायों में बंटे हुए हैं। पर यह बात भारतीय राजनीतिज्ञों के उन्नत वर्ग को स्वीकार नहीं है। वे कहते हैं कि यूरोप में भारत जैसे सामाजिक विभाजन हैं और उसकी पुष्टि के लिए पर्याप्त तथ्य हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश में सामाजिक विभाजन यदि भारत से अधिक नहीं है, तो उसके बराबर तो है ही। भारत की भांति ही अमरीका में भी आपराधिक षड्यंत्र और विश्वास के सूत्र में बंधे लोग अथवा समूह हैं, जो जनता का शोषण करते हैं। वहां न केवल राजनीतिक उप - विभाजन हैं, अपितु औद्योगिक, वैज्ञानिक तथा धार्मिक संघ भी हैं जिनके लक्ष्य तथा अभिवृत्तियां एक - दूसरे से भिन्न हैं। अलग - अलग लक्ष्यों वाली राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक समूहों, गुटों और दलों के अलावा हम देखते हैं कि अमरीका में लोगों का स्थायी विभाजन भी है, जैसे पोल, डच, स्वीड, जर्मन, रूसी आदि। उनमें से प्रत्येक की अपनी भाषा, धार्मिक तथा नैतिक आचार संहिता और परंपराएं हैं। यदि सामाजिक विभाजन किसी देश को प्रतिनिधि सरकार के लिए आयोग्य ठहराते हैं, तो भारत की भांति वह पैमाना अमरीका पर भी लागू होना चाहिए। अतः यदि समस्त सामाजिक विभाजन के होते हुए अमरीका प्रतिनिधि सरकार की योग्यता रखता है, तो भारत क्यों नहीं रखता? अत्यंत हठी एवं दुराग्रही भारतीय राजनीतिज्ञों से पूछिए और उन्हें बताइए कि भारत के सामाजिक विभाजन भिन्न प्रकार के हैं, या फिर उनका दावा स्वीकार कर लीजिए। इन दो के अलावा तीसरा विकल्प नहीं हो सकता।
मेरे विचार में उनके तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत के सामाजिक विभाजन राजनीतिक के लिए आवश्यक हैं। वे किस प्रकार आवश्यक होते हैं,