1. मताधिकार के बारे में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य - Page 24

साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य

7

इस बात को समझने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले यह समझा जाए कि वे कब आवश्यक नहीं होते। लोग सामान बातों के आधार पर समुदाय में रहते हैं। समुदाय का रूप धारण करने के लिए जो बातें अति आवश्यक हैं, वे हैं - लक्ष्य, आस्थाएं, आकांक्षाएं, ज्ञान और आपसी सद्भाव; या यदि समाजशास्त्रियों की भाषा में कहा जाए तो उनमें विचारों की समानता अवश्य होनी चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि उनमें विचारों की समानता कैसे उत्पन्न हो? निश्चय ही यह एक केक के टुकड़े को बांटकर खाने वाली समानता नहीं है। दूसरों जैसी प्रवृत्ति अथवा दूसरों जैसी विचार - समता पैदा करने का अर्थ है कि उनसे संपर्क हो अथवा उनकी गतिविधि में हिस्सा लिया जाए। केवल शारीरिक निकटता से लोगों में वैचारिक समानता नहीं आ जाती और न ही एक - दूसरे से दूर हो जाने पर उनकी वैचारिक समानता समाप्त होती है। किसी समूह के साथ विचार - समता के लिए एक ही उपाय है कि समूह में रहा जाए। प्रत्येक समूह चाहता है कि वह अपनी अलग प्रकार की विचार - समता पैदा करे, लेकिन जहां राजनीतिक संघ में लाए जाने के लिए एक से अधिक समूह हों, वहां अलग - अलग विचार - समता रखने वालों के बीच संघर्ष पैदा होगा। और जब तक समूह अलग - अलग रहेंगे, संघर्ष बना ही रहेगा और वह कार्य के सामंजस्य में बाधक होगा। समूहों का यह अलगाव ही मुख्य दोष है। जहां समूहों के बीच अंतःप्रसरण होता रहता है, वहां दोष नहीं रहता, क्योंकि समूहों के बीच अंतःप्रसरण से एक बार समाजीकृत प्रवृत्तियों का पुनः समाजीकरण हो सकता है। पुराने के स्थान पर एक नई वैचारिक समानता जन्म ले लेती है और वह विभिन्न समूहों के हितों, लक्ष्यों तथा आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। सामंजस्यपूर्ण जीवन चाहे सामाजिक हो या राजनीतिक, उनके लिए विचार - समता अति आवश्यक है। जैसा कि अभी - अभी बताया गया है, वह इस बात पर निर्भर करता है कि कितना संपर्क, भागीदारी अथवा अंतःप्रसरण हुआ है। भारत में विभाजनों के लिए यह कसौटी अपनाकर हमें उनके बारे में कहना होगा कि वे सामंजस्यपूर्ण राजनीतिक जीवन की प्राप्ति के पथ के कांटे हैं।

  1. अपनी निश्चित वैचारिक समानता के कारण जिन जनसमूहों या वर्गों में विरोध है, वे इस प्रकार हैं :

(1) हिन्दू, (2) मुसलमान, (3) ईसाई, (4) पारसी, (5) यहूदी, आदि।

हिन्दुओं को छोड़कर शेष वर्गों या विभाजनों की यह विशेषता है कि उनमें अपने भीतर से संपर्क की ऐसी पूर्ण और आजादी है कि हम उनके सदस्यों से एक - दूसरे से साथ पूर्ण विचार - साम्य बनाए रखने की आशा कर सकते हैं। लेकिन जहां तक हिन्दुओं का संबंध है, कुछ और अधिक विश्लेषण करना होगा। हिन्दुओं के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हिन्दू होने से पूर्व वे किसी जाति के सदस्य हैं। जातियां इतनी एकांतिक तथा अलग - अलग हैं कि हिन्दू गैर - हिन्दू के प्रति मुख्यतः हिन्दूपन की भावना से व्यवहार करेगा। लेकिन वह दूसरी जाति के हिन्दू के प्रति मुख्यतः जाति भावना के आधार पर व्यवहार करेगा। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जहां तक दो हिन्दुओं का संबंध है, उनके बीच जातीय