8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विचार - समता उन दोनों के हिन्दू होने से पैदा हुई विचार - समता से अधिक बलवती है। इस प्रकार, वैचारिक समानता वाले व्यक्तियों के बीच बाहर से तो है ही, भीतर से भी विरोध होने की संभावना रहती है। कुछ लोग तर्क प्रस्तुत करते हैं कि यह विरोध तो वर्ण - व्यवस्था के समूचे ताने - बाने में व्याप्त है। लेकिन इसका अत्यधिक प्रतिवाद किया जा रहा है। संपर्क की दृष्टि से हिन्दू, जातियों के बावजूद दो प्रमुख वर्गों में बंटे हुए हैं - स्पृश्य और अस्पृश्य। स्पृश्यों के बीच पर्याप्त संपर्क है, जिसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जहां तक उनका संबंध है, उनकी वैचारिक समानता में विरोध होने की आशंका नहीं है। लेकिन स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों की विचार - समता में वास्तविक अंतर और विरोध है। उनके बीच अंतःसंपर्क में अस्पृश्यता सबसे बड़ी बाधा है। उनका पूर्णतः अलग - थलग होना इस बात का प्रमाण है कि उनकी वैचारिक समता के बीच गहरी खाई है।
अतः भारत के वास्तविक सामाजिक विभाजन इस प्रकार हैं :(1) स्पृश्य हिन्दू, (2) अस्पृश्य हिन्दू, (3) मुसलमान, (4) ईसाई, (5) पारसी, और (6) यहूदी।
अतः यदि नीति को लोकप्रिय सरकार का रूप देना है, तो नीति तंत्र तैयार करते समय इन वास्तविक विभाजनों की अनदेखी करना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि लोकप्रिय सरकार की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि निर्वाचन - क्षेत्र तथा मताधिकार सामाजिक शक्तियों को कितने सुचारु रूप से संचारित करते हैं और कितने सुचारु रूप से वे व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हैं, तो हमें सबसे पहले इस बात पर विचार करना होगा कि चुनाव के समय इन समूहों के बीच विद्यमान विरोध कैसा रूप धारण करेगा।
मतदाताओं के उपुर्यक्त वर्गों वाले किसी प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्र में वही उम्मीदवार संबंधित निर्वाचन - क्षेत्र का प्रतिनिधि घोषित किया जाएगा, जो बहुमत प्राप्त करेगा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसा उम्मीदवार प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्र के मतदाताओं का सच्चा प्रतिनिधि है? क्या वह निर्वाचन - क्षेत्र की विचारधारा का वास्तविक प्रतिनिधित्व करता है? क्या वह निर्वाचन - क्षेत्र के समस्त हितों का प्रतिनिधि है? क्या यह निश्चय रूप से कहा जा सकता है कि हिन्दू उम्मीदवार मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व करेगा? यहां यह याद रखना ही होगा कि उपर्युक्त विभिन्न विभाजन ऐसे हित समूह से जुड़े हुए हैं, जो गैर - धर्मनिरपेक्ष हैं या पूर्णतया धार्मिक हैं। हम यह नहीं कह सकते हैं कि प्रत्येक विभाजन ऐसे हित समूहों से जुड़ा है, जो धर्मनिरपेक्ष अथवा भौतिक हैं। यदि ऐसा है तो धर्मनिरपेक्षता के लिए समूहों को तोड़ना होगा। भौतिक हितों की दृष्टि से मुसलमान, पारसी, हिन्दू, आदि जैसा कोई समूह नहीं है। इन समूहों में से प्रत्येक में जमींदार, श्रमिक, पूंजीपति, स्वतंत्र व्यापारी, संरक्षणवादी, आदि होंगे। हर समूह में भौतिक हित वाले समुदाय हिन्दू, मुसलमान, पारसी, आदि होंगे। अतः हिन्दू उम्मीदवार मुसलमानों के भौतिक हितों का तथा मुस्लिम उम्मीदवार हिन्दुओं के भौतिक हितों की भली - भांति प्रतिनिधित्व कर सकता है। इस दृष्टि से