1. मताधिकार के बारे में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य - Page 26

साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य

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इन समुदायों के बीच भौतिक हित का कोई खास विरोध नहीं है। यदि मान लें कि भविष्य में मनुष्य के कार्यों में धार्मिक हितों का स्थान गौण रहेगा, तो किसी समूह के धर्मनिरपेक्ष हितों का प्रतिनिधित्व किसी अन्य समूह का प्रतिनिधि कर सकता है।

  1. इस दृष्टि से लोकप्रिय सरकार के लिए प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्र पर्याप्त होगा। लेकिन कुछ और गहराई से विचार करने पर पता चलेगा कि वह लोकप्रिय सरकार की परिभाषा के केवल आधे अंश के लिए पर्याप्त होगा। यह कहां तक सच है, इसी पर हम विचार करेंगे। किसी प्रादेशिक निर्वाचन - क्षेत्र में जब विभिन्न वर्गों के बीच चुनाव लड़ा जाएगा तो मतदाता उस उम्मीदवार का पक्ष लेंगे, जिसके साथ उनकी सहानुभूति होगी। लेकिन किसके साथ सहानुभूति होगी, यह उनके लिए पहले से ही तय कर लिया जाता है। यदि वे अलग - अलग समूहों के दो उम्मीदवार हों और वे दोनों एक ही हित का प्रतिनिधित्व करते हों, तो मतदाता अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देंगे। जिस वर्ग के मतदाताओं की संख्या अधिक होगी, उसी का उम्मीदवार चुन लिया जाएगा। मतदाताओं के इस पक्षपात के कारण अल्पसंख्यक वर्गों के सदस्यों को व्यक्तिगत प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता, हालांकि उनके हितों का प्रतिनिधित्व तो होता है।

  2. जो लोग हितों तथा विचारों के समुचित तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व की योजनाएं तैयार करने में जुटे हुए हैं, उनकी दृष्टि में व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के महत्व पर विस्तृत विवेचन करना व्यर्थ हो सकता है। लेकिन इसके कारण व्यक्ति का प्रतिनिधित्व महत्वहीन तो नहीं हो जाता। हाल ही में ‘जनता द्वारा सरकार’ की अपेक्षा ‘जनता के लिए सरकार’ ने अधिक ध्यान आकर्षित किया है। वस्तुतः इस बात के उदाहरण मौजूद हैं कि ‘जनता द्वारा सरकार’ के बिना भी ‘जनता के लिए सरकार’ अपने सही अर्थ में बनी रह सकती है। फिर भी राजनीति के सभी सिद्धांतवादी सर्वसम्मति से इस प्रकार की सरकार की निंदा करेंगे। ऐसा क्यों है, इसकी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। यह तो स्वीकार करना होगा कि हर प्रकार की संस्था सीख देती है और वह अपने सदस्यों की क्रियाशील मनोवृत्ति पर रचनात्मक प्रभाव डालती है। अतः व्यक्ति का जो रूप होता है, उसी रूप में वह दूसरों से जुड़ता है। ‘जनता के लिए सरकार’, न कि ‘जनता की सरकार’ निश्चित ही कुछ लोगों को स्वामी तथा दूसरों को परतंत्र बनने की शिक्षा देगी। कारण यह है कि संस्था के प्रतिक्रियात्मक प्रभाव से कोई व्यक्ति व्यक्तित्व के विकास का अनुभव और अंकन कर सकता है। व्यक्तित्व - विकास समाज का सर्वोच्च लक्ष्य होता है। सामाजिक व्यवस्था द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा कार्य करने के लिए जिसे करने में वह समर्थ है, निर्बाध पहलकदमी तथा अवसर उपलब्ध कराया जाना है, बशर्तें यह कार्य सामाजिक दृष्टि से वांछनीय हो। नई भूमिका व्यक्तित्व का पुनः नवीनीकरण तथा विकास करती है। लेकिन जब संस्था, सरकार भी एक संस्था ही है, ऐसी होती है कि उसमें सभी लोग प्रत्येक भूमिका अदा नहीं कर सकते, तो होता यह है कि वह बहुजन के व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध करके चंद लोगों के व्यक्तित्व का विकास करने लगती है।