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भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण

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चुकाने की दशा में बेदखल की गई जमीन के सर्वे नंबरों की नीलामी की जाती है, तो केवल उन्हीं व्यक्तियों को कब्जे के अधिकारों की नीलामी में बोली देने का अधिकार होना चाहिए, जिनकी जमीनें उसके साथ लगी हों। भूमि के टुकड़ों को एकत्र करने में सहायक एक तरीका यह है कि यदि कोई आदमी अपनी जमीन बेचना चाहता है, तो पूर्व क्रय का अधिकार उसके पड़ोसी किसानों को दिया जाना चाहिए। तथापि यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इन उपायों से मिली सफलता बहुत कम मात्रा में होगी। विखंडन की बुराइयां बहुत अधिक हैं। अतः चकबंदी की एक विशद योजना बनानी पड़ेगी। इसलिए बड़ौदा कमेटी रिपोर्ट में इस बात की वकालत की गई है कि यदि गांव के दो - तिहाई खातेदार, जिनके पास गांव की आधी से अधिक भूमि हो, दरख्वास्त कर दें तो सरकार को अनिवार्य तौर पर उस गांव में चकबंदी का काम शुरू कर देना चाहिए। यह चकबंदी दो सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए : (1) आर्थिक लाभकारी इकाई, और (2) मूल स्वामित्व। बड़ौदा कमेटी ने इन दो सिद्धांतों की विशेषताएं इन शब्दों में व्यक्त की हैं ख्6, :

सबसे पहले हर जोत का मूल्य आकंका जाता है। फिर उनकी मूल सीमाएं मिटा

दी जाती हैं, सड़कों के लिए निशानदेही की जाती है और सार्वजनिक उपयोग के

लिए भूमि अलग कर दी जाती है तथा शेष भूमि के नए खंड या प्लाट बनाए जाते

हैं। हर नए प्लाट का आकार इतना होना चाहिए कि जमीन, जुताई, आदि की

स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए लाभकारी सिद्ध हो, अर्थात वह इतना बड़ा हो

कि एक परिवार को उस पर वर्ष-भर काम मिलता रहे और पैदावार से वह अपना

जीवन - निर्वाह कर सके। ये नए प्लाट फिर नीलामी द्वारा पुराने भूमि मालिकों को

ब्ेचे जाएं और खरीद कर कुछ बंदिशें हों, जिससे काश्तकार बड़ी संख्या में बेदखल

न हो जाएं। खरीद से मिले धन को जमीन के टुकड़ों के मूल मालिकों में एक

निश्चित अनुपात में बांट दिया जाए। उसका एक भाग खर्चों के लिए अलग रख

दिया जाए, जिसमें सरकार भी अपनी ओर से कुछ योगदान देगी। एक और ढंग

यह है कि गांव की सारी भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाए और फिर नए प्लाट

बनाकर उन्हें नीलामी द्वारा बेचा जाए, जैसे कि नगर विकास ट्रस्ट या सरकार नई

सड़कें डालते समय या शहरों का विस्तार करते समय करते हैं। परंतु कृषि भूमि

का सुधार करते समय हम इसे अपनाने की सिफारिश नहीं करेंगे, क्योंकि इससे

भूमि में सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलेगा और छोटी जोतों के मालिक इतनी बड़ी संख्या

में बेदखल हो जाएंगे कि उन्हें बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा।

दूसरे तरीके के अनुसार, जब चकबंदी करने का फैसला कर लिया जाए तो सभी

खातेदारों और उनकी जोतों की सूची बना ली जाए और पंच लोग बाजार भाव के

आधार पर जोतों का मूल्य लगा लें। फिर भूमि का पुनर्वितरण कर दिया जाए और हर

  1. बड़ौदा कमेटी रिपोर्ट, पृष्ठ 35