भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 239
जोतों की अनिवार्य चकबंदी के बारे में प्रो. जेवन्स और बड़ौदा कमेटी, का प्रस्ताव यह है कि कमिश्नर या आयुक्त नियुक्त किए जाएं, जो चकबंदी की दरख्वास्तें सुनें और उन पर अमल करवाएं। यदि किसी को कोई आपत्ति हो और उसे लगे कि उससे अन्याय हुआ है, तो उसे अदालत में याचिका दायर करने और स्टे या निषेधाज्ञा लेने का अधिकार होना चाहिए।
जोतों की यह चकबंदियां बाद में भी बनी रहें, यह काम बाद में विधायिका को करना चाहिए। बहुत से लोग बिना कोई प्रश्न किए यह स्वीकार करते हैं कि हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों के उत्तराधिकार के कानून ऐसे हैं, जो भूमि के उप-विभाजन के लिए जिम्मेदार होते हैं। किसी हिन्दू या मुसलमान के लिए मृत्यु के बाद उसके वारिसों को यह अधिकार होता है कि बिना किसी
3कावट या कठिनाई के वे मृतक की संपत्ति में समान हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं। अब यदि नई चकबंदी वाली जोत पर भी विरासत का यही कानून लागू होता रहा, तो वह जोत अपने नए आकार में लंबे समय तक नहीं बनी रहेगी। यदि चकबंदी के बाद भी विरासत का यह कानून बना रहा तो चकबंदी बहुत देर तक टिकेगी नहीं।
पर उत्तराधिकार का वर्तमान कानून कैसे बदला जाए? यदि समान उप - विभाजन का कानून न रहे तो उसकी जगह ज्येष्ठाधिकार का कानून अपनाया जाए। ख्9, बड़ौदा कमेटी का विचार है :
यह आवश्यक नहीं है कि इसे लागू किया जाए। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि
एक निश्चित सीमा के बाद भूमि का उप - विभाजन न होने दिया जाए और अच्छी
कृषि के लिए यह सीमा तक की जा सकती है। जोत का उप - विभाजन करने पर तब
तक कोई आपत्ति नहीं होगी, जब तक वह उप - विभाजन के लिए निर्धारित न्यूनतम
सीमा से कम नहीं जाए। परंतु जब उप - विभाजन के फलस्वरूप वह अलाभकारी होने
की सीमा तक पहुंच जाती है, तो परिवार के अन्य सदस्यों को उसका और ज्यादा
उप - विभाजन करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। और ज्यादा उप - विभाजन करने
की जगह या तो परिवार के सभी सदस्य मिल - जुलकर उस पर खेती करें, या वह
पूरी की पूरी जोत परिवार के किसी एक सदस्य को दे दी जाए और वह सदस्य
बाकी सदस्यों को मुआवजे के रूप में उनके हिस्से का मूल्य चुका दे। ख्10, 9. उत्तराधिकार की इन दो प्रणालियों के अतिरिक्त एक तीसरी प्रणाली भी है, जिसमें पिता को यह स्वतंत्रता रहती है कि वह अपनी परिसंपत्ति के एक भाग के साथ जो चाहे कर सकता है, बशर्तें कि वह अपने उत्तराधिकारियों के लिए पर्याप्त छोड़ जाए। इसके अंतर्गत जर्मनी के एक अनुपात (परिमिसिव) कानून बनाया है, जो उत्तराधिकार के फलस्वरूप होने वाली उपपहलू ऐसे है, जिनमें बड़ौदा कमेटी के प्रस्तावों का पूर्वानुमान झलकता है और शेष ऐसे हैं, जिनमें मानीय श्री कीटिंग के प्रस्ताव नजर आते हैं। विवरण हेतु देखें, प्रो. एन. जी. पियरसंस द्वारा लिखित प्रिसिंपल आफ - विभाजन की बुराइयों को दूर करना चाहता है। इसके कुछ
इकोनोमिक्स, खंड 2, पृष्ठ 286 - 90
- बड़ौदा कमेटी रिपोर्ट, पृष्ठ 26