240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अचल संपत्तियों का उत्तराधिकारियों में न बांटने का सिद्धांत यह है कि यदि विभाजन का परिणाम बहुत ही छोटे - छोटे हिस्सों में निकले तो उसे हिस्सेदारों में सबसे ऊंची बोली देने वाले हिस्सेदार को दिया जा सकता है। पर यदि उनमें से कोई बोली देने को तैयार न हो तो बाहर वालों को बोली लगाने दी जाए और इस तरह जो धन मिले, उसे सभी हिस्सेदारों में उचित अनुपात में बांट दिया जाए। इसी सिद्धांत को भारतीय बंटवारा अधिनियम, 1893 की सं. 4, धारा 2 में स्वीकार कर लिया गया है, जिसमें कहा गया हैः
जब कभी बंटवारे के किसी मामले में, जिसमें यदि वह इस अधिनियम के लागू होने
से पहले दायर किया गया हो, बंटवारे की डिक्री पास कर दी गई थी, अदालत को
यह लगता है कि संपत्ति की प्रवृत्ति ऐसी है या उसके हिस्सेदारों की संख्या ऐसी
है या कोई ऐसी विशेष परिस्थितियां हैं कि बंटवारा उचित ढंग से या सुविधापूर्वक
नहीं किया जा सकता और यह कि संपत्ति की बिक्री करके सभी हिस्सेदारों को धन
के वितरण से अधिक लाभ होगा, जो अदालत यदि चाहे तो किसी भी हिस्सेदार के
निजी या सामूहिक अनुरोध पर संपत्ति की बिक्री का और प्राप्त धन के वितरण का
निर्देश दे सकती है।
यदि उत्तराधिकार के कानून में इस तरह के परिवर्तन लाना उचित हो तो इसके लिए केवल सिविल प्रक्रिया संहिता में संशोधन की आवश्यकता होगी और अदालतों के लिए यह लाजिमी हो जाएगा कि ऐसी स्थिति में बंटवारे की अनुमति न दें, जब वह पूर्व - निर्धारित आर्थिक सीमाओं से खेत का आकार कम कर दें।
इस समस्या के हल का एक और तरीका बंबई प्रेसिडेंसी के कृषि निदेशक माननीय श्री जी. एफ. कीटिंग ने सुझाया है। अपने प्रारूप विधेयक में नत्थी वक्तव्य के उद्देश्यों और कारणों में उन्होंने कहा है :
- इस विधेयक का उद्देश्य ऐसे भूमि - मालिकों को, जो अपनी भूमि का और अधिक
उप - विभाजन रोकना चाहते हैं, इस योग्य बनाना है कि वह यदि अन्यथा संभव
हो तो अपनी जोतों की स्थायी चकबंदी कर सकें और कार्यकारी सरकार को
भी इस योग्य बनाना है कि वह गैर - अधिकृत भूमि के संबंध में भी ऐसे ही
कदम उठा सकें। इस कानून का उद्देश्य केवल इस योग्य बनाना है और किसी
जोत के बारे में यह अमल में तभी आएगा, जब उस जोत में रुचि रखने वाला
व्यक्ति स्पष्ट रूप में ऐसी इच्छा व्यक्त करे।
- इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इस विधेयक में जिस स्कीम की व्यवस्था है,
वह संक्षेप में इस प्रकार है : भूमि का एक टुकड़ा लाभकारी इकाई बन सके,
इसके लिए नियमों द्वार निर्धारित रजिस्टर में उसकी प्रविष्टि करानी होगी।
यदि इस भूमि पर कब्जा किया जाता है, तो उस भूमि में मालिकाना हक रखने
वाले व्यक्ति कलेक्टर को एक दरख्वास्त दे सकते हैं कि भूमि को लाभकारी
जोत के रूप में रजिस्टर किया जा सकता है। जब कलेक्टर यह न समझे
कि दरख्वास्त को रद्द करने के पर्याप्त कारण हैं, तो वह उसकी सावधानीपूर्वक
जांच करता है और उसके लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की प्रक्रिया
अपनाता है। यदि कार्यवाही से पता चलता है कि मालिकाना हित रखने वाले