भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 243
यहां इतना कहना पर्याप्त होगा कि वह अपने मॉडल फार्म के समर्थन में कोई ठोस आर्थिक कारण नहीं दे पाए।
बड़ौदा कमेटी का हाल तो और भी बुरा है। प्रो. जेवन्स आदर्श लाभकारी जोत की कम से कम एक परिभाषा पर जमे रहते हैं। परंतु बड़ौदा कमेटी की रिपोर्ट में यह दोष है कि उसमें कई परिभाषाएं दी गई हैं। उल्लिखित सारणी में राज्य की जोतों के औसत आकार के बारे में टिप्पणी करते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि कमेटी चकबंदी तो चाहती थी, किन्तु वह जोत के वर्तमान आकार से संतुष्ट थी, जैसा कि इससे स्पष्ट होता है :
यदि खातेदार का एक ही सुसंगत खेत उक्त आंकड़ों के आकार का हो तो यह स्थिति
आदर्श होगी और उस दिशा में कुछ अधिक करने की जरूरत नहीं रहेगी। ख्13,
पर कमेटी शायद अन्यमनस्क थी। जिस समस्या की जांच का और जिस पर रिपोर्ट देने का काम कमेटी को सौंपा गया था, उसका गंभीरता से विश्लेषण किए बिना कमेटी ने कह दिया :
एक आदर्श लाभकारी जोत अच्छी भूमि के एक ही खंड में 30 से 50 बीघे की होगी,
जिसमें कम से कम सिंचाई का एक अच्छा कुआं और एक अच्छा घर भी हो। ख्14,
यदि वर्तमान जोत आदर्श आकार की है तो फिर उसका आकार बड़ा करने की क्या जरूरत है? इस सवाल का कमेटी कोई जवाब नहीं देती। केवल यही नहीं, कमेटी अपनी लाभकारी जोत के आकार की सीमा पर जमी भी नहीं रह पाती। जब वह गांव के बिखरे हुए खेतों को लाभकारी बनाने के लिए उन्हें एकत्र करने की योजना पर विचार करती है, तब वह एक तीसरी आदर्श लाभकारी जोत की बात करती है। इसे प्राप्त करने के लिए वह कहती है :
इनमें से हर नया प्लाट ऐसे आकार का होना चाहिए कि जो स्थानीय भूमि और
काश्तकारी आदि की स्थिति को देखते हुए लाभकारी जोत सिद्ध हो, यानी यह इतनी
बड़ी हो, जिसमें एक परिवार पूरी तरह व्यस्त रह सके और अपना पेट पाल सके। ख्15,
इस तरह बड़ौदा कमेटी बड़े आराम से एक आदर्श लाभकारी जोत के लिए तीन बातें कहती है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कमेटी की रिपोर्ट में उलझे हुए तर्क दिए गए हैं, यद्यपि इसमें विषय के बारे में जानकारी का मूल्याकन भंडार है।
माननीय श्री कीटिंग के अनुसार, एक लाभकारी जोत एक ऐसी जोत है, जो इतनी पैदावार देती है कि एक व्यक्ति खर्चे निकाल कर अपना और अपने परिवार का पेट आराम से पाल सके। ख्16,
प्रासंगिक उद्धरण, भूमिका में
प्रासंगिक उद्धरण, पृष्ठ 4
बड़ौदा कमेटी रिपोर्ट, पृष्ठ 31
वही, पृष्ठ 53
रूरल इकोनोमी इन द बाम्बे डेक्कन, पृष्ठ 51